Word-Meaning: - [१] वे प्रभु (इनः) = स्वामी हैं, (वाजानाम्) = सब अन्नों व शक्तियों के (पतिः) = पति हैं । [२] (इन:) = ब्रह्माण्ड के स्वामी प्रभु (पुष्टीनाम्) = अपना पोषण करनेवालों के (सखा) = मित्र हैं । प्रभु निर्बलों के मित्र नहीं 'नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः ' । विलासमय जीवन ही हमें 'क्षीणायु' बनाता है, यह विलासी पुरुष ही प्रभु की कृपा दृष्टि को प्राप्त नहीं करता । [३] वे (हर्यतः) = जाने योग्य व चाहने योग्य प्रभु (श्मश्रु) = [श्मनि श्रितं नि०] शरीर में आश्रित 'इन्द्रियों, मन व बुद्धि' को (प्र दूधोद्) = प्रकर्षेण कम्पित करके निर्मल करनेवाले हैं। जैसे झाड़कर कपड़े के मल को दूर कर दिया जाता है, उसी प्रकार वे प्रभु हमारी इन्द्रियों, मन व बुद्धि को भी झाड़कर निर्मल बना देते हैं । इन्द्रियों की निर्बलता दूर हो जाती है, मन की मैल भस्मीभूत चकनाचूर हो जाती है और बुद्धि उज्ज्वल हो उठती है । [४] 'इतने अनन्त जीवों के मलों को वे प्रभु कैसे दूर सकते होंगे' ? इस शंका का करना व्यर्थ है, वे अनन्त शक्ति प्रभु इन अपने एक देश में होनेवाले जीवों को (वृथा) = अनायास ही (वि दूधोद्) = विशिष्टरूप से झाड़कर ठीक कर देते हैं। वे प्रभु तो वे हैं (यः) = जो (अदाभ्यः) = किसी से हिंसित होनेवाले नहीं ।
Connotation: - भावार्थ- वे प्रभु सबके स्वामी हैं। वे प्रभु ही चाहनेवालों व प्रभु की ओर जानेवालों के मलों का अपहरण करते हैं।