मार्जन [पत्नी संतति व पति]
Word-Meaning: - [१] वे प्रभु एक घर में (आधीषमाणायाः) = [आत्मार्थं धीयमानायाः सा० ] आत्म प्राप्ति के लिये अपना पूरण करनेवाली [धी = To accomplish ] (च) = और अतएव (शुचायाः) = पवित्र जीवनवाली गृहिणी का (पतिः) = रक्षक है । (च) = और इसी प्रकार (शुचस्य) = पवित्र आचरणवाले गृहपति का वह रक्षक है। प्रस्तुत मन्त्र में 'आधीषमाणाया: ' से पत्नी का, 'शुचाया: ' से सन्तति का और 'शुचस्य' से पति का भी ग्रहण किया जा सकता है। पत्नी आत्म प्राप्ति के लिये अपने कर्तव्य कर्मों में सदा लगी रहती है। इन कर्मों से ही वह आत्म-दर्शन की अधिकारिणी बनती है। इसके कर्त्तव्यपालन से ही सन्तति, शुचि व पवित्र बनती है। इसका व्यवहार ही पति को भी 'शुच' पवित्र बना देता है। जिन पत्नियों का व्यवहार सुन्दर नहीं होता, उनके पति कुञ्ज में आनन्द की तलाश करते फिरते हैं और एक विचित्र - सा अस्वाभाविक जीवन बिताने के लिये विवश होते हैं वहाँ पवित्रता की सम्भावना नहीं रहती। [२] और तो और वह तो (अवीनाम्) = भेड़ों के भी (वासोवायः) = बच्चों का विस्तार करनेवाला है, बुननेवाला है । भेड़ों के भी वस्त्रों का जो ध्यान करता है, वह प्रभु ही (वासांसि) = हमारे इन पञ्चकोश रूप वस्त्रों को (आमर्मृजत्) = पूर्ण शुद्ध बना देता है । अन्नमयकोश के रोगरूप मालिन्य को दूर करता है, तो प्राणमय के नैर्बल्य रूप मल को । मनोमयकोश से 'ईर्ष्या, क्रोध, द्वेष' आदि को हटाता है और विज्ञानमयकोश की कुण्ठता को दूर भगाता है। ये प्रभु ही आनन्दमयकोश को निर्मल बनाकर उसे 'सहस्' से पूर्ण करते हैं एवं इस प्रभु की कृपा से ही हमारा जीवन शुद्ध होता है ।
Connotation: - भावार्थ- पवित्र जीवनवाले पति-पत्नी ही प्रभु रक्षा के पात्र होते हैं । वे प्रभु भेड़ों का भी पालन करते हैं तो हमारा पालन क्यों न करेंगे ?