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प्रत्य॑र्धिर्य॒ज्ञाना॑मश्वह॒यो रथा॑नाम् । ऋषि॒: स यो मनु॑र्हितो॒ विप्र॑स्य यावयत्स॒खः ॥

English Transliteration

pratyardhir yajñānām aśvahayo rathānām | ṛṣiḥ sa yo manurhito viprasya yāvayatsakhaḥ ||

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Pad Path

प्रति॑ऽअर्धिः । य॒ज्ञाना॑म् । अ॒श्व॒ऽह॒यः । रथा॑नाम् । ऋषिः॑ । सः । यः । मनुः॑ऽहितः । विप्र॑स्य । य॒व॒य॒त्ऽस॒खः ॥ १०.२६.५

Rigveda » Mandal:10» Sukta:26» Mantra:5 | Ashtak:7» Adhyay:7» Varga:13» Mantra:5 | Mandal:10» Anuvak:2» Mantra:5


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यज्ञानां प्रत्यर्धिः) श्रेष्ठ कर्मों का प्रतिवर्धक-अत्यन्त बढ़ानेवाला या पोषक (रथानाम्-अश्वहयः) रमणीय पदार्थों का व्यापक प्रेरणा करनेवाले (सः-यः-मनु-हितः) वह परमात्मा मननशील उपासकों का हितकर है (विप्रस्य यावयत्सखः) बुद्धिमान् उपासकों का समागम करनेवाला मित्र (ऋषिः) सर्वज्ञ परमात्मा है ॥५॥
Connotation: - परमात्मा समस्त श्रेष्ठ कर्मों का पोषक, रमणीय पदार्थों का महान् प्रेरक, मननशील उपासकों का हितकर मिलनेवाला मित्र और पोषणकर्त्ता सर्वज्ञ है ॥५॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

वह यावयत्सखा,

Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार हमारी बुद्धियों के सिद्ध करनेवाले तथा मलों को कम्पित करके दूर करनेवाले प्रभु ही (यज्ञानां प्रत्यर्धिः) = [प्रति + ऋ + इ] प्रत्येक यज्ञ का समर्थन करनेवाले हैं। एक-एक यज्ञ को वे ही समृद्ध करते हैं। प्रभु कृपा बिना कोई भी हमारा यज्ञ पूर्ण नहीं होता । [२] वे प्रभु ही (रथानाम्) = हमारे इन शरीररूप रथों के (अश्वहयः) = [हयं गतौ] इन्द्रियाश्वों के द्वारा आगे और आगे ले चलनेवाले हैं। [३] ऋषिः = वे प्रभु ही तत्वद्रष्टा हैं। (स) = वे वे हैं (यः) = जो (मनुर्हितः) = मनुष्य का सच्चा हित करनेवाले हैं। (विप्रस्य) = अपना पूरण करनेवाले मेधावी पुरुष के वे (यावयत् सख:) = ऐसे मित्र हैं जो उसे पाप से पृथक् कर रहे हैं और हित से युक्त कर रहे हैं। मित्र का यही तो लक्षण है 'पापान्निवारयति योजयते हिताय'। वे प्रभु हमें सदा पाप से निवारित कर रहे हैं [यु=अमिश्रण] तथा हित से युक्त कर रहे हैं [यु- मिश्रण] । ऐसा सच्चा मित्र ही तो हमारा हित कर सकता है। सांसारिक मित्र तो ज्ञान की कमी के कारण कभी गलत भी सलाह दे सकता है, प्रभु तो ऋषि हैं, तत्त्वद्रष्टा हैं, वहाँ गलत प्रेरणा का प्रश्न ही नहीं उठता एवं ये प्रभु ही हमारे सच्चे मित्र हैं।
Connotation: - भावार्थ- हमारे सब यज्ञ प्रभु कृपा से पूर्ण होते हैं, यह शरीर - यन्त्र भी प्रभु कृपा से चलता है । वे प्रभु तत्वद्रष्टा व हितचिन्तक मित्र हैं सो हमें बुराई से दूर करके भलाई से जोड़ रहे हैं ।
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यज्ञानां प्रत्यर्धिः) यज्ञानां श्रेष्ठकर्मणां प्रतिवर्धकः “प्रति पूर्वाद्-ऋधधातोर्बाहुलकादिन् प्रत्ययः” [औणादिकः] (रथानाम्-अश्वहयः) रमणीयानां पदार्थानां व्यापकप्रेरकः (सः-यः मनुः-हितः) स यः खलु मननशीलानां हितो हितकरः (विप्रस्य यावयत्सखः) मेधाविन उपासकस्य मिश्रणधर्मणा समाप्तिं कुर्वतां पूषा-पोषयिता (ऋषिः) सर्वज्ञः परमात्माऽस्ति ॥५॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Pusha is the promoter and accomplisher of yajnas, energy, power and mover of the shining stars, all seeing creator of joy, well wisher of humanity and inspiring guide and friend of the sages.