Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार हमारी बुद्धियों के सिद्ध करनेवाले तथा मलों को कम्पित करके दूर करनेवाले प्रभु ही (यज्ञानां प्रत्यर्धिः) = [प्रति + ऋ + इ] प्रत्येक यज्ञ का समर्थन करनेवाले हैं। एक-एक यज्ञ को वे ही समृद्ध करते हैं। प्रभु कृपा बिना कोई भी हमारा यज्ञ पूर्ण नहीं होता । [२] वे प्रभु ही (रथानाम्) = हमारे इन शरीररूप रथों के (अश्वहयः) = [हयं गतौ] इन्द्रियाश्वों के द्वारा आगे और आगे ले चलनेवाले हैं। [३] ऋषिः = वे प्रभु ही तत्वद्रष्टा हैं। (स) = वे वे हैं (यः) = जो (मनुर्हितः) = मनुष्य का सच्चा हित करनेवाले हैं। (विप्रस्य) = अपना पूरण करनेवाले मेधावी पुरुष के वे (यावयत् सख:) = ऐसे मित्र हैं जो उसे पाप से पृथक् कर रहे हैं और हित से युक्त कर रहे हैं। मित्र का यही तो लक्षण है 'पापान्निवारयति योजयते हिताय'। वे प्रभु हमें सदा पाप से निवारित कर रहे हैं [यु=अमिश्रण] तथा हित से युक्त कर रहे हैं [यु- मिश्रण] । ऐसा सच्चा मित्र ही तो हमारा हित कर सकता है। सांसारिक मित्र तो ज्ञान की कमी के कारण कभी गलत भी सलाह दे सकता है, प्रभु तो ऋषि हैं, तत्त्वद्रष्टा हैं, वहाँ गलत प्रेरणा का प्रश्न ही नहीं उठता एवं ये प्रभु ही हमारे सच्चे मित्र हैं।
Connotation: - भावार्थ- हमारे सब यज्ञ प्रभु कृपा से पूर्ण होते हैं, यह शरीर - यन्त्र भी प्रभु कृपा से चलता है । वे प्रभु तत्वद्रष्टा व हितचिन्तक मित्र हैं सो हमें बुराई से दूर करके भलाई से जोड़ रहे हैं ।