वायु व जल में प्रभु-दर्शन
Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार वह पूषा हमें स्पृहणीय बुद्धि, उत्तम इन्द्रियाश्व व प्राणापान को प्राप्त कराये (यस्य) = जिस प्रभु के (त्यत्) = उस प्रसिद्ध (वाताप्यम्) = [वात + अप + य] वायु व जल में प्रकट होनेवाले (महित्वम्) = महत्त्व को (अयम्) = यह (विप्रः) = मेधावी (जनः) = मनुष्य (आवंसत्) = संभजते-सम्यक् सेवन करता है और (धीतिभिः) = ध्यान के द्वारा अथवा यज्ञादि उत्तम कर्मों के द्वारा (सुष्टुतीनाम्) = उस पूषा की उत्तम स्तुतियों को (चिकेत) = जानता है । [२] प्रभु की महिमा इस पाञ्चभौतिक संसार के प्रत्येक भूत में प्रकट हो रही है, परन्तु जीव विशेषकर उस महिमा को जल व वायु में देख पाता है । एक मिनिट के लिए भी वायु बन्द हुई तो दम घुटने लगता है, जल के बिना भी एक दिन का बिताना कठिन हो जाता है । सो बहती हुई वायु में तथा बहते हुए इन जलों में प्रभु की महिमा झट दिख पाती है। संस्कृत साहित्य में वायु तो 'प्राण' ही है, जल भी 'जीवन' है । ये प्राणि जीवन के दो मूल-स्तम्भ हैं । [३] वस्तुतः यह मेधावी मनुष्य जितना-जितना ध्यान करता है, प्रकृति के पदार्थों का चिन्तन करता है, उतना उतना ही उन पदार्थों में प्रभु की महिमा का दर्शन करता है । उसे हिमाच्छादित पर्वत, समुद्र व पृथ्वी सभी प्रभु की महिमा का प्रतिपादन करते प्रतीत होते हैं। आकाश को आच्छादित करनेवाले तारे प्रभु की स्तुति करते दिखते है।
Connotation: - भावार्थ - उस पूषा की महिमा वायु व जल आदि सभी पदार्थों में सुव्यक्त है।