Word-Meaning: - [१] (इन्द्रम्) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु को (यजामहे) = हम पूजते हैं अथवा अपने साथ संगत करते हैं अथवा उसके प्रति अपना अर्पण करते हैं [ यज्, पूजा, संगतिकरण, दान] जो प्रभु (वज्रदक्षिणम्) = क्रियाशीलता में दक्षिण हैं, कुशलता से कार्यों को करनेवाले हैं। जो प्रभु (विव्रतानाम्) = विविध व्रतों वाले, भिन्न-भिन्न कार्यों को करनेवाले (हरीणाम्) = इन्द्रियाश्वों के (रथ्यम्) = शरीर रूप रथ में जोतने में उत्तम हैं। जिन्होंने इन विविध कार्यशक्ति सम्पन्न इन्द्रियाश्वों को इस शरीर रूप रथ में जोता है। [२] ये प्रभु ही (श्मश्रु) = [श्मनि शरीरे श्रितं ] शरीर के आश्रय से रहनेवाली इन्द्रियों, मन व बुद्धि को (प्रदोधुवत्) = प्रकर्षेण कम्पित करनेवाले हैं। झाड़कर उनकी मैल को दूर करनेवाले हैं (ऊर्ध्वथा भूत्) = सदा ऊपर विद्यमान हैं, अर्थात् हमारे रक्षण के लिये सावधानता से खड़े हैं। इस रक्षण कार्य में प्रभु कभी प्रमाद नहीं करते। [३] ये प्रभु (सेनाभिः) = पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों, पाँच प्राणों व पाँच अन्तरिन्द्रियों [मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, हृदय] की सेनाओं से (वि दयमानः) = [देङ् रक्षणे] हमारा विशेषरूप से रक्षण करते हैं । (वि राधसा) = सब संसारिक आवश्यकताओं को सिद्ध करनेवाले धन के द्वारा भी वे प्रभु हमें रक्षण प्राप्त कराते हैं । हमें उस धन की प्रभु कमी नहीं होने देते, जो कि भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये आवश्यक है ।
Connotation: - भावार्थ- हम प्रभु का पूजन करते हैं। प्रभु हमारे इन्द्रियादि के मल को दूर करते हैं, सदा हमारे रक्षण के लिये उद्यत हैं और हमें उन्नति के अध्यात्म साधनों को तथा भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये धन को देते हैं ।