Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार जब हम इन्द्रियों का निरोध कर पाते हैं तो (इन्द्र) = हे परमैश्वर्यशालिन् प्रभो! आप (नः) = हमारे से (आपृक्षसे) = संपृक्त होते हैं । इन्द्रियों का निरोध करके ही तो (ब्रह्म) = दर्शन का सम्भव होता है। [२] इस सम्पर्क के होने पर (अस्माकम्) = हमारा (ब्रह्म) = ज्ञान (उद्यतम्) = [raised, lifted up] उन्नत होता है। प्रभु के सम्पर्क में आकर हमारा जीवन प्रकाशमय हो उठता है । प्रभु प्रकाश के पुञ्ज हैं, उनके सम्पर्क में आनेवाला अन्धकार में रह ही कैसे सकता है ? [३] इस प्रकाश को प्राप्त करके हम हे प्रभो ! (त्वा) = आप से (तत्) = उस (अवः) = रक्षण व (शुष्णम्) = बल को (याचामहे) = माँगते हैं, (यत्) = जो बल (अमानुषम्) = अमनुष्योचित प्रत्येक बुराई को (हन्) = नष्ट कर देती है। प्रभु से 'प्रकाश, रक्षण व बल' को प्राप्त करके हम सब आसुर भावनाओं को दूर करने व दिव्यभावनाओं को अपनाने में समर्थ होते हैं। हमारे अमानुष भाव दूर होते हैं और हमारे में दिव्य भावों का विकास होता है। 'अमानुष' शब्द क्रूरता व स्वार्थ का संकेत करता है, ये सब क्रूर व स्वार्थमयी भावनायें प्रभु के प्रकाश से नष्ट हो जाती हैं।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु कृपा से हमें वह शत्रु-शोषक बल प्राप्त हो जो कि हमारे सब अमानुष भावों को दूर करके हमें सच्चा मनुष्य बनने की क्षमता प्राप्त कराये ।