Word-Meaning: - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् ! (शूर) = सब शत्रुओं का संहार करनेवाले प्रभो ! (सोमं) = सोम को (पिबा पिबा) = अवश्य हमारे शरीर में ही व्याप्त कीजिये। इस सोम-वीर्य के शरीर में व्याप्त होने पर ही हम पूर्ण जीवन वाले बन सकेंगे। (मा रिषण्यः) = हे प्रभो ! हमें हिंसित मत करिये। सोम के शरीर में व्याप्त होने पर हिंसित होने का प्रश्न नहीं रहता । [२] हे (वसवान) = हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले प्रभो ! (वसुः सन्) = सब के निवासक होते हुए आप (गृणतः) = स्तुति करनेवाले (उत) = और (मघोनः) = [मघ व्रतः, मघ, मख] = यज्ञशील हम लोगों का (त्रायस्व) = रक्षण करिये । (च) = और (महः रायः) = महनीय धनों से (नः) = हमें (रेवतः) = रयि व धनों वाला (कृधी) = करिये। प्रभु के स्तवन का यह परिणाम होता है कि हम ऐश्वर्यशाली होकर उस ऐश्वर्य का विनियोग यज्ञों में करते हैं, उन धनों के कारण भोगासक्त नहीं हो जाते।
Connotation: - भावार्थ- सोमरक्षण हमारे जीवनों को देव-जीवन बना देता है। सूक्त का प्रारम्भ इस प्रकार हुआ है कि ऋषि लोग हृदयदेश में प्रभु का ध्यान करते हैं । [१] प्रभु 'वज्री व ऋचीषम' हैं, [२] वे बल के स्वामी हैं, [३] प्रभु के प्रिय वे ही होते हैं जो कि इन्द्रयाश्वों को विरोचमान मार्ग से ले चलते हैं, [४] यह ठीक है कि इन्द्रियाँ अत्यन्त प्रबल हैं, [५] पर, इन का संयम करके ही हम प्रभु-दर्शन कर पायेंगे, [६] तभी अमानुषभावों को दूर करके मनुष्य बनेंगे, [७] हमें दास वृत्ति का दमन करना चाहिये, [८] सब कामनाओं के पूरक प्रभु ही हैं, [९] हम तत्त्वज्ञानी व अक्षीशक्ति बनकर ही प्रभु प्रिय होते हैं, [१०] दान की वृत्ति हमें प्रभु का प्रिय बनाती है, [११] प्रभु भक्तों की इच्छाएँ उत्तम होती हैं, और अवश्य पूर्ण होती हैं, [१२] प्रभु उपासक सत्य व अहिंसा का व्रत लेता है, [१३] उसके भोग बढ़ते हैं, पर वह उनमें फँसता नहीं, [१४] यह महनीय धनों से धनी होता है, [१५] सो हम उस प्रभु का यजन करें ।