'अमर्त्य - सहसावन्- अग्नि'
Word-Meaning: - [१] हे (अग्ने) = अग्रेणी, (सहसावन्) = बल-सम्पन्न, (अमर्त्य) = किसी भी विषय के पीछे न मरनेवाले अमर प्रभो ! (यम्) = जिस भी (रयिम्) = धन को आप (मन्यसे) = आदरणीय समझते हैं (तम्) = उस (यज्ञेषु) = यज्ञों में विनियुक्त होने पर (चित्रं) = [चित्र] ज्ञान की वृद्धि के कारण भूत धन को (नः) = हमारे लिये (आभरा) = धारण कीजिये । प्रभु अग्नि हैं, अग्र स्थान पर स्थित हैं, क्योंकि सहसावन्-बल-सम्पन्न हैं। बिना बल के अग्नित्व प्राप्त नहीं होता, प्रभु बल-सम्पन्न हैं, क्योंकि अमर्त्य हैं, प्रभु विषयप्रसक्त नहीं है । ये तीन सम्बोधन हमें भी प्रेरणा दे रहे हैं कि 'अमर्त्य' बनकर 'सहसावन्' बनो, तभी 'अग्नि' बन पाओगे। [२] हे प्रभो ! हमें इस रयि को इसलिये प्राप्त कराइये कि हम (वः) = आपकी प्राप्ति के (वि-मदे) = प्रकृष्ट आनन्द में (विवक्षसे) = विशिष्ट उन्नति के लिये हों । यह रयि यज्ञों में विनियुक्त होता हुआ हमारी विषयाशक्ति का कारण न बनकर सदा उन्नति का ही कारण हो और इस प्रकार यह धन (वाजसातये) = शक्ति की प्राप्ति के लिये हो [वाज - शक्ति, साति-प्राप्ति] । [३] 'वाजसाति' शब्द संग्राम के लिये भी प्रयुक्त होता है। यह धन हमें काम, क्रोध, लोभादि के साथ चलनेवाले अध्यात्म-संग्राम में सहायक हो। हमें इस धन के दास बनकर इस संग्राम में हार न जायें। यह धन हमें ह्रास की ओर न ले जाकर सदा उत्थान की ओर ले जानेवाला हो ।
Connotation: - भावार्थ- 'प्रभु' अग्नि सहसाधन व अमर्त्य हैं। प्रभु हमें भी वह रयि प्राप्त करायें जिससे कि हम भी ऐसे ही बन सकें।