Word-Meaning: - [१] हे प्रभो ! (त्वाम्) = आपको (उ) = निश्चय से (ते) = वे (स्वाभुवः) = [स्यं आभवन्ति] सब प्रकार स्वाश्रित लोग, (अश्वराधसः) = व्याप्त धनों वाले लोग (शुम्भन्ति) = अपने जीवन में सुशोभित करते हैं। प्रभु को प्राप्त लोगों के दो चिह्न हैं एक तो यह कि वे पराश्रित नहीं होते, अपने पाँव पर खड़े होते हैं, और दूसरा यह कि वे अर्जित धनों का विनियोग केवल अपने लिये नहीं करते। लोकहित के लिये धनों का विनियोग करते हुए वे 'व्याप्त धनों वाले' कहलाते हैं । [२] हे प्रभो ! (त्वाम्) = आपको (उपसेचनी) = लोकों को सुखों से सिक्त करने की क्रिया (वेति) = प्राप्त कराती है। अर्थात् यदि एक व्यक्ति दुःखितों पर करुणार्द्रचित्त होकर उनके दुःखों को दूर करता है और उनको सुखों की वर्षा से सिक्त करता है तो यह व्यक्ति आपको प्राप्त होता है। [३] हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (ऋजीतिः) = ऋजुता व सरलता आपको प्राप्त कराती है। सरलता प्रभु प्राप्ति का साधन बनती है। इसी प्रकार (आहुतिः) = त्याग व दान आपको प्राप्त कराता है । एवं प्रभु प्राप्ति के तीन साधन हैं - [क] लोगों को, दुःख दूर करके, सुखसिक्त करना, [ख] सरलता व [ग] त्याग । [४] यह प्रभु प्राप्ति (वः) = तुम सबके (मदे) = मद के निमित्त होती है, अर्थात् एक अद्भुत मस्ती वाले जीवन को जन्म देती है और (विवक्षसे) = विशिष्ट उन्नति के लिये होती है।
Connotation: - भावार्थ- 'प्रभु-भक्त' अपराश्रित व व्याप्तधन होता है। प्रभु प्राप्ति के लिये करुणार्द्रता, ऋजुता व त्याग आवश्यक हैं। प्रभु प्राप्ति से आनन्द मिलता है और सर्वतोमुखी उन्नति होती है।