Devata: अग्निः
Rishi: विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः
Chhanda: निचृद्गायत्री
Swara: षड्जः
य॒ज्ञा॒साहं॒ दुव॑ इषे॒ऽग्निं पूर्व॑स्य॒ शेव॑स्य । अद्रे॑: सू॒नुमा॒युमा॑हुः ॥
English Transliteration
Mantra Audio
yajñāsāhaṁ duva iṣe gnim pūrvasya śevasya | adreḥ sūnum āyum āhuḥ ||
Pad Path
य॒ज्ञ॒ऽसह॑म् । दुवः॑ । इ॒षे॒ । अ॒ग्निम् । पूर्व॑स्य । शेव॑स्य । अद्रेः॑ । सू॒नुम् । आ॒युम् । आ॒हुः॒ ॥ १०.२०.७
Rigveda » Mandal:10» Sukta:20» Mantra:7
| Ashtak:7» Adhyay:7» Varga:3» Mantra:1
| Mandal:10» Anuvak:2» Mantra:7
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BRAHMAMUNI
Word-Meaning: - (अद्रेः सूनुम्) स्तुतिकर्ता या प्रशंसक के प्रेरक (आयुम्-आहुः) आयुरूप-आयुप्रद उसे कहते हैं (यज्ञसाहम्) अध्यात्मयज्ञ के या राजसूययज्ञ के सहने योग्य (पूर्वस्य शेवस्य) उत्कृष्ट सुख के (दुवः-अग्निम्-इषे) आराधनीय तथा परिचरणीय परमात्मा या राजा को प्रार्थित करता हूँ-चाहता हूँ ॥७॥
Connotation: - परमात्मा या राजा स्तुतिकर्ता अथवा प्रशंसक को आगे प्रेरित करता है। वह परमात्मा या राजा आयुरूप-आयु देनेवाला होता है। अध्यात्मयज्ञ में परमात्मा आश्रयणीय है। दोनों ही श्रेष्ठ सुख के देनेवाले हैं ॥७॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
'यज्ञासाह' अग्नि
Word-Meaning: - [१] (यज्ञासाहम्) = यज्ञों के द्वारा समन्तात् शत्रुओं का पराभव करनेवाले, अर्थात् हमारे में यज्ञवृत्ति को उत्पन्न करके हमारे काम, क्रोध लोभादि को समाप्त करनेवाले, (अग्निम्) = उस अग्रेणी प्रभु को लक्ष्य करके (दुवः परिचरणम्) = उपासना को इषे चाहता हूँ। मेरी कामना यह होती है कि मैं उस यज्ञ पुरुष का उपासक बनूँ जो कि यज्ञाग्नि में हमारे सब मलों को भस्मीभूत कर देते हैं । [२] उस प्रभु को (पूर्वस्य) = सर्वप्रथम व सर्वश्रेष्ठ (शेवस्य) = सुख व आनन्द का (सूनुम्) = प्रेरक (आहुः) = कहते हैं । वे प्रभु उस अवर्णनीय आनन्द को देनेवाले हैं जो आनन्द अन्य सब आनन्दों का अतिशायी है । उस प्रभु को (अद्रेः) = बड़ी कठिनता से विदारण के योग्य, पाँच पर्वों वाली अविद्यारूपी पर्वत का (आयुम्) = [इगतौ] हिला देनेवाला कहते हैं । उस प्रभु की कृपा से यह अत्यन्त दृढ़ अविद्या की चट्टान भी चकनाचूर हो जाती है । एवं प्रभु कृपा से हमारा अज्ञान नष्ट होकर हमें उत्कृष्ट आनन्द प्राप्त होता है ।
Connotation: - भावार्थ - यज्ञवृत्ति से सब पाप दूर होते हैं, तब प्रभु हमें अवर्णनीय आनन्द प्राप्त कराते हैं ।
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BRAHMAMUNI
Word-Meaning: - (अद्रेः सूनुम्) श्लोककृतः-स्तुतिकर्तुरुपाकस्य प्रशंसकस्य वा “अद्रिरसि श्लोककृत्” [कठ०१।५] प्रेरकम् (आयुम्-आहुः) आयुरूपमायुप्रदं वा कथयन्ति विद्वांसस्तम् (यज्ञसाहम्) अध्यात्मयज्ञस्य राजसूययज्ञस्य वा सोढुं योग्यम् (पूर्वस्य शेवस्य) उत्कृष्टस्य सुखस्य “शेवः सुखनाम” [निघ०३।४] (दुवः-अग्निम्-इषे) आराधनीयम् “दुवस्यति राध्नोतिकर्मा” [निरु०१०।२०] नमस्यं परिचरणीयं सेवनीयं वा “दुवस्यत……नमस्यतेत्येतत्” [श०६।८।१।६] “दुवस्यति परिचरणकर्मा” [निघ०३।५] परमात्मानं राजानं वा प्रार्थये-इच्छामि वा ॥७॥
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DR. TULSI RAM
Word-Meaning: - I love and adore Agni, the refulgent power that conducts the spiritual and social yajna of the highest order. A celebrity worthy of worship, inexhaustible treasure of eternal joy, inspirer of dedicated devotees, life giver, indeed the very life of existence as they call him.
