Word-Meaning: - [१] वे प्रभु (मानुषस्य) = करुणापूर्ण मन वाले मनुष्य के [Humane = मानुष], मनुष्यों का हित चाहनेवाले व्यक्ति के (हव्या) = हव्य पदार्थों का (जुषत्) = सेवन करते हैं । अर्थात् लोकहित की भावना से जब मनुष्य त्यागपूर्वक उपभोग करता है तो वह प्रभु को प्रीणित करनेवाला है । [२] वस्तुतः मनुष्य यज्ञ करता है, तो वे प्रभु (ऊर्ध्वः तस्थौ) = ऊपर खड़े होते हैं, अर्थात् उन यज्ञों की रक्षा कर रहे होते हैं । प्रभुरक्षण से ही तो यज्ञ पूर्ण हो पाते हैं । [३] वे प्रभु यज्ञे इन यज्ञों में ही (ऋभ्वा) = [उरु भाति] खूब देदीप्यमान होते हैं । वस्तुतः जहां यज्ञ, वहीं प्रभु का निवास । अयज्ञिय स्थलों में प्रभु का प्रकाश नहीं होता । [४] इन यज्ञशील पुरुषों के लिये वे प्रभु (सद्म मिन्वन्) = उत्तम देवगृहों का निर्माण करते हैं, अर्थात् इन को उत्तम लोकों में जन्म देते हैं और (पुरः एति) = इनके आगे आगे चलते हैं, अर्थात् इनके लिये मार्गदर्शन होते हैं। प्रभु के नेतृत्व में इन यज्ञशील पुरुषों का सदा कल्याण ही होता है।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु के लिये यज्ञशील पुरुष ही प्रिय हैं, यज्ञों के रक्षक प्रभु ही हैं। इन यज्ञशील पुरुषों को उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।