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यमा॒सा कृ॒पनी॑ळं भा॒साके॑तुं व॒र्धय॑न्ति । भ्राज॑ते॒ श्रेणि॑दन् ॥

English Transliteration

yam āsā kṛpanīḻam bhāsāketuṁ vardhayanti | bhrājate śreṇidan ||

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Pad Path

यम् । आ॒साः । कृ॒पऽनी॑ळम् । भा॒साऽके॑तुम् । व॒र्धय॑न्ति । भ्राज॑ते । श्रेणि॑ऽदन् ॥ १०.२०.३

Rigveda » Mandal:10» Sukta:20» Mantra:3 | Ashtak:7» Adhyay:7» Varga:2» Mantra:3 | Mandal:10» Anuvak:2» Mantra:3


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यं कृपनीडम्) जिस शक्ति-आगार या दयासदन ( भासा केतुम्) ज्ञानप्रकाशक को (आसा) उपासना से अथवा आश्रय कर (वर्धयन्ति) अपने आत्मा में साक्षात् करते हैं या अपने को बढ़ाते हैं और जो (श्रेणिदन् भ्राजते) परमात्मा या राजा प्राणिगण के लिए भोजन देता हुआ प्रकाशमान होता है ॥३॥
Connotation: - शक्ति का सदन परमात्मा या राजा ज्ञानप्रकाशक होता है, उसकी उपासना या आश्रय से उपासक अपने आत्मा में उसे साक्षात् करते हैं और प्रजाएँ राजा के आश्रय से वृद्धि प्राप्त करती हैं। परमात्मा प्राणिगण को और राजा प्रजाओं को भोजन देता है ॥३॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'कृप-नीड' प्रभु

Word-Meaning: - [१] (यम्) = जिस प्रभु को भक्त लोक (आसा) = [आस्येन] मुख के द्वारा, स्तुतिवचनों के उच्चारण के द्वारा (वर्धयन्ति) = बढ़ाते हैं अर्थात् जिस प्रभु का गुणगान करते हैं वे प्रभु (कृपनीडम्) = [कृपू सामर्थ्ये] सम्पूर्ण सामर्थ्यो के आश्रयस्थल हैं, सर्वशक्तिमान् हैं और (भासाकेतुं) = ज्ञान के प्रकाश के द्वारा [कित निवासे रोगापनयने च] हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले तथा हमारे सब रोगों को दूर करनेवाले हैं। [२] वे प्रभु (श्रोणिदन्) = उपासकों के लिये अभीष्ट फलों की श्रेणियों के देनेवाले हैं- [अभीष्ट फलसमूह प्रदः सा० ] अथवा सब जीवों को कर्मानुसार विविध श्रेणियों के प्राप्त करानेवाले हैं। वे प्रभु हमारे कर्मानुसार 'पशु मनुष्य व देव' आदि श्रेणियों में जन्म देते हैं। ऐसे वे प्रभु (भ्राजते) = कण-कण में देदीप्यमान हो रहे हैं । उस प्रभु की महिमा सर्वत्र द्योतित होती है ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु सम्पूर्ण सामर्थ्यो के आधार हैं, ज्ञान के द्वारा मार्ग का प्रकाशन करते हैं। हम करके अभीष्ट फल समूह को प्राप्त करनेवाले प्रभु का स्तवन करेंगे तो हम भी शक्ति व ज्ञान को प्राप्त होंगे।
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यं कृपनीडम्) यं खलु शक्त्यागारं यद्वा दयासदनम् “नीडं गृहनाम” [निघ०३।४] (भासाकेतुम्) ज्ञानदीप्त्या ज्ञेयं ज्ञानप्रकाशकं वा (आसा) उपासनया यद्वाऽऽश्रयेण (वर्धयन्ति) स्वात्मनि साक्षात्कुर्वन्ति यद्वा स्वात्मानं वर्धयन्ति, यश्च (श्रेणिदन् भ्राजते) परमात्मा राजा वा श्रेण्यै प्राणिगणाय प्रजागणाय वा भोजनं ददत् तन्मध्ये प्रकाशते ॥३॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni, refulgent giver of light and sustenance, profound abode of love, power and kindness, source of light and knowledge, whom people exalt with prayer and adoration shines in glory.