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यद्वो॑ व॒यं प्र॑मि॒नाम॑ व्र॒तानि॑ वि॒दुषां॑ देवा॒ अवि॑दुष्टरासः । अ॒ग्निष्टद्विश्व॒मा पृ॑णाति वि॒द्वान्येभि॑र्दे॒वाँ ऋ॒तुभि॑: क॒ल्पया॑ति ॥

English Transliteration

yad vo vayam pramināma vratāni viduṣāṁ devā aviduṣṭarāsaḥ | agniṣ ṭad viśvam ā pṛṇāti vidvān yebhir devām̐ ṛtubhiḥ kalpayāti ||

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Pad Path

तत् । वः॒ । व॒यम् । प्र॒ऽमि॒नाम॑ । व्र॒तानि॑ । वि॒दुषा॑म् । दे॒वाः॒ । अवि॑दुःऽतरासः । अ॒ग्निः । तत् । विश्व॑म् । आ । पृ॒णा॒ति॒ । वि॒द्वान् । येभिः॑ । दे॒वान् । ऋ॒तुऽभिः॑ । क॒ल्पया॑ति ॥ १०.२.४

Rigveda » Mandal:10» Sukta:2» Mantra:4 | Ashtak:7» Adhyay:5» Varga:30» Mantra:4 | Mandal:10» Anuvak:1» Mantra:4


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (देवाः) हे द्युस्थान के ग्रहों ! (वयम्-अविदुष्टरासः) हम ज्योतिर्विद्या में सर्वथा अज्ञानी (वः-विदुषाम्) तुम ज्योतिर्विद्या के ज्ञाननिमित्तों के (यत्-व्रतानि-प्रमिनाम) जिन कर्मों-नियमों को हिंसित करते हैं-तोड़ते हैं, भूल करते हैं (अग्निः-विद्वान्) सूर्य अग्नि ज्ञान का निमित्त हुआ (तत्-विश्वम्-आपृणाति) उस सब को पूरा कर देता है (येभिः-ऋतुभिः-देवान् कल्पयाति) जिन काल क्रियाओं द्वारा वह ग्रहों को अपने सौरमण्डल के गतिमार्ग में गति करने को समर्थ बनाता है ॥४॥
Connotation: - ग्रहों के ज्ञान में अनभिज्ञ जन जो भूल कर देते हैं, सूर्य को ठीक-ठीक समझने पर वह भूल दूर हो जाती है। कारण कि सूर्य ही कालक्रम से ग्रहों को सर्व गति-मार्गों में चलाता है। विद्वानों के शिक्षण में कहीं अपनी अयोग्यता से भूल या भ्रान्ति प्रतीत हो, तो विद्यासूर्य महा विद्वान् से पूर्ति करनी चाहिये ॥४॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

व्रतभंग दोष परिहार

Word-Meaning: - हे (देवाः) = देवो! (विदुषां वः) = ज्ञान सम्पन्न आप लोगों के (व्रतानि) = व्रतों को (अविदुष्टरास:) = अज्ञानी से बने हुए (वयम्) = हम (यत्) = जो (प्रमिनाम) = हिंसित करते हैं (तद् विश्वम्) = उस सब को विद्वान् समझदार (अग्निः) = प्रगतिशील व्यक्ति (अपृणाति) = सब प्रकार से पूरित करता है। ज्ञानी लोगों के कुछ व्रत होते हैं। ये ही व्रत योगदर्शन के शब्दों में 'यम-नियम' के रूप में कहे गये हैं । वेद में ये ही व्रत 'ऋत व सत्य' हैं। विद्वान् लोग वैयक्तिक व सामाजिक हित के दृष्टिकोण से इन व्रतों का पालन करते हैं । परन्तु एक नासमझ व्यक्ति क्षणिक आनन्द को महत्त्व देता हुआ इन व्रतों को अपनी अदूरदर्शिता से तोड़ बैठता है। पर जो व्यक्ति समझदार व प्रगतिशील होता है वह एक बार गिर जाने पर भी उठ खड़ा होता है, और प्रायश्चितादि के द्वारा उस व्रतभंग दोष को समाप्त करने के लिये प्रयत्न करता है और उस व्रत में आयी कमी को दूर करता है । ये व्रत में आयी कमी को दूर करने के प्रयत्न वे होते हैं (येभिः) = जिनसे (ऋतुभिः) = नियमित गतियों के द्वारा यह अग्नि अपने जीवन में (देवान्) = दिव्यगुणों को (कल्पयाति) = उत्पन्न करता है अथवा दैवी वृत्तियों को फिर से शक्तिशाली बनाता है । हमारी हृदयस्थली में देवों व असुरों का संग्राम तो निरन्तर चलता है। एक समझदार 'विद्वान्' व्यक्ति ऋतुओं की तरह नियमित गतियों से देवों को शक्तिशाली बनाता है और इस प्रकार आसुरवृत्तियों को पराजित करता है ।
Connotation: - भावार्थ- हम मूर्खता से विद्वानों से पालन किये जानेवाले व्रतों को तोड़ बैठते हैं। हम 'विद्वान् व अग्नि' बनकर उन व्रतभंग दोषों को दूर करें और मर्यादित आचरण से [ऋतुभिः] दिव्यवृत्तियों को प्रबलता प्राप्त कराएँ ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (देवाः) हे द्युस्थानिनो ग्रहास्तद्वेत्तारो वा ! (वयम्-अविदुष्टरासः) वयं ज्योतिर्विद्यायां सर्वथाऽज्ञानिनः (वः-विदुषाम्) युष्माकं वेद्यानां विदुषां वा (यत्-व्रतानि-प्रमिनाम) यत् खलु कर्म नियमेन हिंस्मः-उल्लङ्घयेम (अग्निः-विद्वान् तत्-विश्वम्-आपृणाति) स सूर्यो ज्ञाननिमित्तः सन् तत् सर्वमापूरयति पूर्णं करोति (येभिः-ऋतुभिः-देवान् कल्पयाति) यैः कालैर्द्युस्थानान् ग्रहादीन् स स्वकीयसौरमण्डलस्थे मार्गे गमनाय समर्थान् करोति ॥४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - And if we, being ignorant and deficient, neglect or transgress or overstep the laws and disciplines of those who know, then, O divinities, Agni, the sun, the sage, being abundant and graciously fulfilling, makes all that up and saves us by those very powers and actions in time and seasons by which it keeps the sages and divinities in the systemic order.