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संस॒मिद्यु॑वसे वृष॒न्नग्ने॒ विश्वा॑न्य॒र्य आ । इ॒ळस्प॒दे समि॑ध्यसे॒ स नो॒ वसू॒न्या भ॑र ॥

English Transliteration

saṁ-sam id yuvase vṛṣann agne viśvāny arya ā | iḻas pade sam idhyase sa no vasūny ā bhara ||

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Pad Path

सम्ऽस॑म् । इत् । यु॒व॒से॒ । वृ॒ष॒न् । अग्ने॑ । विश्वा॑नि । अ॒र्यः । आ । इ॒ळः । प॒दे । सम् । इ॒ध्य॒से॒ । सः । नः॒ । वसू॑नि । आ । भ॒र॒ ॥ १०.१९१.१

Rigveda » Mandal:10» Sukta:191» Mantra:1 | Ashtak:8» Adhyay:8» Varga:49» Mantra:1 | Mandal:10» Anuvak:12» Mantra:1


BRAHMAMUNI

इस सूक्त में मनुष्यों में पृथक्-पृथक् दल न होने चाहिये, सबका एक समाज, एक विचार, मन एक, समान प्रवृत्ति होवे, इत्यादि विषय हैं।

Word-Meaning: - (वृषन्) हे सुखवर्षक अग्रणायक परमात्मन् ! (अर्यः) तू स्वामी होता हुवा (विश्वानि-इत्) सब ही जड़ जङ्गम वस्तुओं को (सं सम्-आ युवसे) सम्यक् भलीभाँति संयुक्त है-सम्प्राप्त है (इळः-पदे) पृथिवी-पार्थिव देह के पद-हृदयस्थान में-या स्तुतिवाणी के पद-अध्यात्मयज्ञ में (समिध्यसे) सम्यक् प्रकाशित होता है, वह तू (नः) हमारे लिए (वसूनि) वसानेवाले धनों को (आ भर) प्राप्त करा ॥१॥
Connotation: - परमात्मा सुख की वर्षा करानेवाला स्वामी है, साड़ी जड़ जङ्गम वस्तुओं को सम्प्राप्त है, वह देह के विशिष्ट स्थान हृदय में या स्तुति के स्थान आध्यात्मयज्ञ में साक्षात् होता है, तब मनुष्यों के लिये बसानेवाले धनों को प्रदान करता है ॥१॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सब के पिता प्रभु

Word-Meaning: - [१] हे (वृषन्) = हम सब पर सुखों का वर्षण करनेवाले, (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! आप (इत्) = निश्चय से (विश्वानि संसं युवसे) = सब प्राणियों को सम्यक् मिलाते हैं। सबके आप पिता हैं। यह एक पितृत्व सबको परस्पर समीप लानेवाला होता है। आपको पिता के रूप में स्मरण करने पर सब परस्पर बन्धुत्व का स्मरण करते हैं । [२] (अर्य:) = आप ही सब के स्वामी हैं। (इडस्पदे) = [इडा-वाणी-वेदवाणी] वेदवाणी के शब्दों में आप (आसमिध्यसे) = सर्वथा दीप्त होते हैं 'सर्वेवेदाः यत्पदमामनन्ति' ‘ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् ' । [२] (सः) = वे आप (नः) = हमारे लिये (वसूनि) = निवास के लिये आवश्यक सब पदार्थों को आभर प्राप्त कराइये। आप ही सब के स्वामी हैं, आप ही सबको वसु प्राप्त कराते हैं ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु सबके पिता हैं। यह एक पितृत्व सब प्राणियों को परस्पर समीप लानेवाला होता है ।

BRAHMAMUNI

अत्र सूक्ते मनुष्यैः पृथक् पृथक् दलानि न सम्पाद्यानि किन्तु सर्वेषां समाजः, एको विचारः, समानं मनः, समाना प्रवृत्तिर्भवेदित्येवं विषयाः सन्ति।

Word-Meaning: - (वृषन्-अग्ने) हे सुखवर्षक ! अग्रणायक ! परमात्मन् ! (अर्यः) त्वं स्वामी भवन् (विश्वानि इत्) सर्वाणि जडजङ्गमानि हि (सं सम् आ युवसे) सम्यक् समन्तात् सम्प्राप्तोऽसि ‘सम्’-इति द्विरुक्तिः पादपूरणे “समुपोदः पादपूरणे” [अष्टा० ८।१।६] अतः (इडः-पदे समिध्यसे) पृथिव्याः “इडा पृथिवीनाम” [निघ० १।१]  पार्थिवस्य देहस्य पदे हृदये यद्वा स्तुतिवाचः पदेऽध्यात्मयज्ञे सम्यक् दीप्यसे (सः-नः-वसूनि-आभर) स त्वमस्मभ्यं सुखस्य-वासकानि-धनानि प्रापय ॥१॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni, self-refulgent, omnipotent master, giver of the showers of Infinity, you bring together and integrate all the elements and constituents of the universe of existence and shine in the earth-vedi fire and in the eloquence of the Voice divine of Veda. Pray bless us with the wealth, honour and excellence of life in the world.