Word-Meaning: - [१] प्रभु जीव को प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि हे (निवर्तन) = जीवनयात्रा को उत्तमता से करनेवाले जीव ! (आवर्तय) = तू अपनी इन इन्द्रियों को इन भूतों व लोकों और दिशा प्रदिशाओं में प्रवृत्त करनेवाला हो 'परीत्य भूतानि, परीत्य लोकान् परीत्य सर्वाः प्रदिशो दिशश्च' । ये इन्द्रियाँ इनके प्रति जाकर इनको बारीकी से देखें और इनके ज्ञान को प्राप्त करनेवाली हों । [२] हे (निवर्तन) = इस संसार में न उलझनेवाले जीव ! तू (निवर्तय) = इन इन्द्रियों को संसार के इन विविध विषयों से तू निवृत्त करनेवाला हो। ये इन्द्रियाँ उन विषयों के अन्दर उलझ न जायें। [३] (भूम्या:) = इस भूमि को (चतस्रः प्रदिशः) = ये चार विस्तृत दिशायें हैं। (ताभ्यः) = उनसे (एना) = इनको (निवर्तय) = तू निवृत्त करनेवाला हो । विषयों से ये इन्द्रियाँ बद्ध न हो जाएँ, तभी हम जीवन यात्रा को पूर्ण करके अपने ब्रह्मलोकरूप घर में वापिस आ सकेंगे।
Connotation: - भावार्थ - इन्द्रियाँ विषयों के ज्ञान के लिये हैं, उनमें फँस जाने के लिये नहीं। इनको विषय व्यावृत्त सूक्त का प्रारम्भ इस प्रकार हुआ है कि हम इन्द्रियों को विषयासक्त न होने देकर 'शक्ति व शान्ति' के तत्त्वों का धारण करते हुए ज्ञानधन को धारण करें। [१] इन्द्रियों को आत्मवश्य करने का प्रयत्न करें, [२] इन्द्रियों को वश में करके हम गोपति बनें, [३] गोपा यही चाहता है कि इन्द्रियाँ विषयों में जायें परन्तु उनमें फँसे नहीं, [१] यह गोपा ही ब्रह्मलोक में लौटता है, [५] हमारी ये इन्द्रियाँ भोगासक्त होकर मृत न हो जाएँ, [६] अन्न, घृत व दुग्ध के सेवन से ये पुष्ट हों, [७] इनको हम भूमि की सब दिशाओं से लौटायें, [८] ऐसा करने पर ही हमारा मन भद्र की ओर प्रेरित होगा । करना हमारा मौलिक कर्तव्य है ।