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परि॑ वो वि॒श्वतो॑ दध ऊ॒र्जा घृ॒तेन॒ पय॑सा । ये दे॒वाः के च॑ य॒ज्ञिया॒स्ते र॒य्या सं सृ॑जन्तु नः ॥

English Transliteration

pari vo viśvato dadha ūrjā ghṛtena payasā | ye devāḥ ke ca yajñiyās te rayyā saṁ sṛjantu naḥ ||

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Pad Path

परि॑ । वः॒ । वि॒श्वतः॑ । द॒धे॒ । ऊ॒र्जा । घृ॒तेन॑ । पय॑सा । ये । दे॒वाः । के । च॒ । य॒ज्ञियाः॑ । ते । र॒य्या । सम् । सृ॒ज॒न्तु॒ । नः॒ ॥ १०.१९.७

Rigveda » Mandal:10» Sukta:19» Mantra:7 | Ashtak:7» Adhyay:7» Varga:1» Mantra:7 | Mandal:10» Anuvak:2» Mantra:7


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (ये के च यज्ञियाः-देवाः) जो कोई भी सत्सङ्ग के योग्य विद्वान् हैं, (रय्या संसृजन्तु) रमणीय ज्ञान से हमें संयुक्त करें (वः) तुम्हें, मैं (ऊर्जा घृतेन पयसा) अन्न, घृत और दुग्ध से (विश्वतः परिदधे) सब प्रकार से परितृप्त करता हूँ ॥७॥
Connotation: - सत्सङ्ग करने योग्य विद्वान् जन हमें रमणीय ज्ञान से संयुक्त करते हैं। हम भी उनको अन्न, घृत, दुग्ध आदि से परितृप्त करें ॥७॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

अन्न-घृत-दुग्ध

Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र में वर्णित (वः) = तुम इन्द्रियों को (ऊर्जा) = बल व प्राणशक्ति के वर्धक अन्नरस के द्वारा, (घृतेन) = मलों के क्षरण व जाठराग्नि को दीप्त करनेवाले घृत के द्वारा, (पयसा) = अप्यायन के साधनभूत दुग्ध के द्वारा (विश्वतः) = सब प्रकार से (परिदधे) = चारों ओर से धारण करता हूँ। अर्थात् सात्त्विक अन्न व गोघृत व गोदुग्ध आदि के प्रयोग से मैं इन इन्द्रियों को ज्ञान प्राप्ति व क्रियाशक्ति के योग्य बनाता हूँ। [२] इस प्रकार इन्द्रियों को सशक्त बनानेवाले (नः) = हमें, (ये के च) = जो कोई भी (यज्ञियाः देवा:) = पूजा के योग्य, संगतिकरण योग्य, ज्ञान का दान करनेवाले देव पुरुष हैं, वे (रय्या) = ज्ञानधन से संसृजन्तु संसृष्ट करें। हमें चाहिये कि हम सात्त्विक अन्न, घृत व दुग्ध के प्रयोग से अपने को ज्ञान ग्रहण के योग्य बनायें और ज्ञानी पुरुष हमें ज्ञानधन से युक्त करें। हमारी योग्यता के अभाव में उन देवों से दिये गये ज्ञान को हम ग्रहण ही न कर पायेंगे ।
Connotation: - भावार्थ - हम ज्ञान प्राप्ति के योग्य बनें और देव हमें ज्ञान देनेवाले हों।
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (ये के च यज्ञियाः-देवाः) ये केचित् सङ्गमनीया विद्वांसः (रय्या संसृजन्तु) रमणीयेन ज्ञानेनास्मान् संयोजयन्तु (वः) युष्मान् (ऊर्जा घृतेन पयसा) अन्नेन ‘अन्नं वा ऊर्क्” [तै०५।४।४।१] घृतेन दुग्धेन च (विश्वतः परिदधे) सर्वतः परितृप्तान् करोमि ॥७॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - I hold, maintain and sustain you all round with energy, water, milk, ghrta and the delicacies of manners and graces of culture.$May those who are divines worthy of yajnic service and association refresh, rejuvenate and advance us with wealth, honour and excellence.