Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र में वर्णित (वः) = तुम इन्द्रियों को (ऊर्जा) = बल व प्राणशक्ति के वर्धक अन्नरस के द्वारा, (घृतेन) = मलों के क्षरण व जाठराग्नि को दीप्त करनेवाले घृत के द्वारा, (पयसा) = अप्यायन के साधनभूत दुग्ध के द्वारा (विश्वतः) = सब प्रकार से (परिदधे) = चारों ओर से धारण करता हूँ। अर्थात् सात्त्विक अन्न व गोघृत व गोदुग्ध आदि के प्रयोग से मैं इन इन्द्रियों को ज्ञान प्राप्ति व क्रियाशक्ति के योग्य बनाता हूँ। [२] इस प्रकार इन्द्रियों को सशक्त बनानेवाले (नः) = हमें, (ये के च) = जो कोई भी (यज्ञियाः देवा:) = पूजा के योग्य, संगतिकरण योग्य, ज्ञान का दान करनेवाले देव पुरुष हैं, वे (रय्या) = ज्ञानधन से संसृजन्तु संसृष्ट करें। हमें चाहिये कि हम सात्त्विक अन्न, घृत व दुग्ध के प्रयोग से अपने को ज्ञान ग्रहण के योग्य बनायें और ज्ञानी पुरुष हमें ज्ञानधन से युक्त करें। हमारी योग्यता के अभाव में उन देवों से दिये गये ज्ञान को हम ग्रहण ही न कर पायेंगे ।
Connotation: - भावार्थ - हम ज्ञान प्राप्ति के योग्य बनें और देव हमें ज्ञान देनेवाले हों।