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आयं गौः पृश्नि॑रक्रमी॒दस॑दन्मा॒तरं॑ पु॒रः । पि॒तरं॑ च प्र॒यन्त्स्व॑: ॥

English Transliteration

āyaṁ gauḥ pṛśnir akramīd asadan mātaram puraḥ | pitaraṁ ca prayan svaḥ ||

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Pad Path

आ । अ॒यम् । गौः । पृश्निः॑ । अ॒क्र॒मी॒त् । अस॑दत् । मा॒तर॑म् । पु॒रः । पि॒तर॑म् । च॒ । प्र॒ऽयन् । स्व१॒॑रिति॑ स्वः॑ ॥ १०.१८९.१

Rigveda » Mandal:10» Sukta:189» Mantra:1 | Ashtak:8» Adhyay:8» Varga:47» Mantra:1 | Mandal:10» Anuvak:12» Mantra:1


BRAHMAMUNI

इस सूक्त में पृथिवी पूर्व दिशा में गति करती है, सूर्य की परिक्रमा भी करती है, सूर्य की ज्योति उदय से अस्तपर्यन्त द्युलोक पृथिवीलोक को तपाती है, इत्यादि विषय हैं।

Word-Meaning: - (आ अयम्) यह पृथिवीलोक (पुरः-अक्रमीत्) पूर्वदिशा में-पूर्व की ओर गति करता है (च) और (पितरं स्वः) पितारूप सूर्य के (प्रयन्) सब ओर गति करता हुआ (मातरं पृश्निम्) मातारूप अन्तरिक्ष को (असदत्) प्राप्त होता है ॥१॥
Connotation: - पृथिवी पूर्व की ओर घूमती है और सूर्य के चारों ओर आकाश में गति करती है ॥१॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

कुण्डलिनी का जागरण व ऊर्ध्व गति

Word-Meaning: - [१] (अयम्) = यह (गौ:) = जागरित होने पर मेरुदण्ड में ऊपर और ऊपर गति करनेवाली कुण्डलिनी, (पृश्नि:) = [ संस्प्रष्टो भासा नि० २।१४ ] ज्योति के साथ सम्पर्कवाली होती है। यह प्राणायाम की उष्णता से (अक्रमीत्) = कुण्डल को तोड़कर आगे गति करती है । [२] यह (पुरः) = आगे और आगे बढ़ती हुई (मातरम्) = वेदमाता को 'स्तुता मया वरदा वेदमाता' (असदत्) = प्राप्त करती है, इसके जागरण व ऊर्ध्व गति के होने पर 'ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा' ऋत का पोषण करनेवाली प्रज्ञा उत्पन्न होती है। यह प्रज्ञा वेदज्ञान का प्रकाश करती हैं। [३] (च) = और इस वेदज्ञान के प्रकाश के होने पर यह (स्वः) = उस देदीप्यमान (पितरम्) = प्रभु रूप पिता की ओर (प्रयन्) = जानेवाली होती है। अर्थात् यह योगी अन्ततः प्रभु का दर्शन करनेवाला होता है ।
Connotation: - भावार्थ - कुण्डलिनी के जागरण से बुद्धि का प्रकाश होता है। उससे वेदार्थ का स्पष्टीकरण होता है और प्रभु की प्राप्ति होती है ।

BRAHMAMUNI

अत्र सूक्ते पृथिवी पूर्वस्यां दिशि गतिं करोति सूर्यस्य परितश्च भ्रमति, सूर्यस्य ज्योतिरुदयास्तयोर्मध्ये द्यावापृथिव्यौ तपति, इत्यादि विषया वर्ण्यन्ते।

Word-Meaning: - (अयं गौः) एष पृथिवीलोकः “गौः-पृथिवीनाम” [निघ० १।१] (पुरः आक्रमीत्) पूर्वस्यां दिशि-पूर्वाभिमुखमाक्रामति (पितरं च स्वः प्रयन्) पितरं  पितृवत्सूर्यम् “स्वः-आदित्यो भवति” [निरु० २।१४] परितो गच्छन् (मातरं पृश्निम्-असदत्) मातरमन्तरिक्षं “मातरि अन्तरिक्षे” [निरु० ७।२७] “पृश्निः-अन्तरिक्षम्’ [ऋ० ४।३।२० दयानन्दः] सीदति ॥१॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - This earth moves round and round eastward abiding in its mother waters of the firmament and revolves round and round its father sustainer, the sun in heaven.