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त्वं त्यमि॑न्द्र॒ मर्त्य॑मास्त्रबु॒ध्नाय॑ वे॒न्यम् । मुहु॑: श्रथ्ना मन॒स्यवे॑ ॥

English Transliteration

tvaṁ tyam indra martyam āstrabudhnāya venyam | muhuḥ śrathnā manasyave ||

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Pad Path

त्वम् । त्यम् । इ॒न्द्र॒ । मर्त्य॑म् । आ॒स्त्र॒ऽबु॒ध्नाय॑ । वे॒न्यम् । मुहुः॑ । श्र॒थ्नाः॒ । म॒न॒स्यवे॑ ॥ १०.१७१.३

Rigveda » Mandal:10» Sukta:171» Mantra:3 | Ashtak:8» Adhyay:8» Varga:29» Mantra:3 | Mandal:10» Anuvak:12» Mantra:3


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (इन्द्र त्वम्) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! तू (आस्त्रबुध्नाय) शरीर के गिरानेवाले कामादि पापों को गिराने में कुशल (मनस्यवे) मनस्वी-मनुष्य के लिए (त्यं वेन्यम्) उस ग्रहण करनेवाले (मर्त्यम्) मनुष्य को (मुहुः श्रथ्नाः) तू बार-बार हिंसित करता है ॥३॥
Connotation: - कामादि पाप को नष्ट करनेवाले मनस्वी जन के बन्धक-बाँधनेवाले को परमात्मा पुनः-पुनः पीड़ित करता है ॥३॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'आत्मबुध्न-मनस्यु'

Word-Meaning: - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यवन् प्रभो ! (त्वम्) = आप (त्यम्) = उस (वेन्यं मर्त्यम्) = [ वेन्- चिन्तायाम् ] निरन्तर विषयों की चिन्ता व कामना करनेवाले 'कामकामी' पुरुष को, विषयों के पीछे मरनेवाले व्यक्ति को (आस्त्रबुध्नाय) = [प्रणवो धनुः] प्रणव- ओंकार रूप अस्त्र को अपना आधार बनानेवाले (मनस्यवे) = विचारशील पुरुष के लिये (मुहुः श्रथ्ना) = निरन्तर विनष्ट करते हो [ मुहुस्=constantly]। [२] प्रभु का उपासन हमें वेन्य से ' आस्त्रबुध्न मनस्यु' बनाता है। उपासना के होने पर हमारी वृत्ति विषयों से विमुख होकर प्रभु-प्रवण होती है। हम प्रभु के 'ओ३म्' नाम को अपना धनुष बनाते हैं । यही हमारे वासनारूप शत्रुओं का विनाश करनेवाला होता है। ऐसी स्थिति में हम विचारशील बनते हैं। अब हम संसार के पदार्थों की कामना से ऊपर उठ जाते हैं। आस्त्रबुध्न बनकर वेन्य नहीं रहते।
Connotation: - भावार्थ- हम प्रभु को अपना आधार बनायें, तभी हम संसार की कामनाओं से ऊपर उठ पायेंगे।
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (इन्द्र त्वम्) हे ऐश्वर्यवन् परमेश्वर ! त्वम् (आस्त्र-बुध्नाय मनस्यवे) बुध्नस्य शरीरस्य “बुध्नं शरीरम्” [ऋ० १।५२।६ दयानन्दः] बुध्नस्य शरीरस्य अस्त्रं क्षेपकं कामादिपापम् “अस्त्रबुध्नम् राजदन्तादिषु परम्” [अष्टा० २।२।३१] इति परनिपातः तन्नाशनकुशलः-आस्त्रबुध्नस्तस्मै मनस्विने (त्यं वेन्यं मर्त्यम्-मुहुः श्रथ्नाः) तं ग्रहीतारं बन्धकम् “वेणृ वेनृ गति…ग्रहणेषु” [भ्वादि०] पुनः पुनः हंसि ॥३॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Indra, for the man of meditative thought and vision on way to freedom of the spirit over body, pray slacken and cast off the bonds of mortal love, hate and jealousy constantly, without relent.