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सर॑स्वति॒ या स॒रथं॑ य॒याथ॑ स्व॒धाभि॑र्देवि पि॒तृभि॒र्मद॑न्ती । आ॒सद्या॒स्मिन्ब॒र्हिषि॑ मादयस्वानमी॒वा इष॒ आ धे॑ह्य॒स्मे ॥

English Transliteration

sarasvati yā sarathaṁ yayātha svadhābhir devi pitṛbhir madantī | āsadyāsmin barhiṣi mādayasvānamīvā iṣa ā dhehy asme ||

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Pad Path

सर॑स्वति । या । स॒ऽरथ॑म् । य॒याथ॑ । स्व॒धाभिः॑ । दे॒वि॒ । पि॒तृऽभिः॑ । मद॑न्ती । आ॒ऽसद्य॑ । अ॒स्मिन् । ब॒र्हिषि॑ । मा॒द॒य॒स्व॒ । अ॒न॒मी॒वाः । इषः॑ । आ । धे॒हि॒ । अ॒स्मे इति॑ ॥ १०.१७.८

Rigveda » Mandal:10» Sukta:17» Mantra:8 | Ashtak:7» Adhyay:6» Varga:24» Mantra:3 | Mandal:10» Anuvak:2» Mantra:8


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (सरस्वति देवि) हे दिव्या स्तुतिवाणी ! (या) जो ये तू (पितृभिः सरथं ययाथ) मनोभावों के साथ समानरमणीय परमात्मा के प्रति जाती है (स्वधाभिः-मदन्ती) वहाँ के आनन्दरसों के साथ हर्षित करती हुई (अस्मिन् बर्हिषि-आसद्य) इस मानस ज्ञानयज्ञ में विराजकर (मादयस्व) हमें हर्षित कर (अस्मे-अनमीवाः-इष-आ धेहि) हमारे लिये रोगरहित कमनीय भोगों को भलीभाँति धारण करा ॥८॥
Connotation: - मानसिक भावनाओं के साथ जब परमात्मा की स्तुति अध्यात्मयज्ञ में की जाती है, तो वह हमें सब रोगों से अलग रखती हुई कमनीय भोगों को धारण कराती है ॥८॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सरस्वती के साथ समान रथ में

Word-Meaning: - [१] हे (सरस्वति) = विद्या की अधिष्ठात्रि देवि ! (या) = जो तू (सरथम्) = हमारे साथ एक ही रथ में [समानं रथं] (ययाथ) = गति करती हो । अर्थात् हमारा यह शरीर रूप रथ हमारा वाहन तो है ही । जब हम इसे सरस्वती का भी वाहन बनाते हैं, अर्थात् स्वाध्याय आदि में प्रवृत्त होते हैं तो उस समय हम सरस्वती के साथ एक ही रथ में बैठे होते हैं । [२] हे (देवि) = प्रकाश की पुंज व हमारे जीवन को प्रकाशित करनेवाली सरस्वती तू (स्व-धाभिः) = आत्मतत्त्व के धारण की प्रक्रियाओं से अर्थात् प्रतिदिन के प्रातः - सायं ध्यान से तथा (पितृभिः) = ज्ञानप्रद आचार्यरूप पितरों के साथ (मदन्ती) = तू हर्ष का अनुभव करती हुई होती है। हमें स्वाध्याय के साथ आत्मतत्त्व का धारण- उपासना तथा आचार्यों का सत्संग अवश्य करना चाहिए। [३] हे सरस्वति ! (अस्मिन् बर्हिषि) = हमारे इस वासनाशून्य हृदय में (आसद्य) = आसीन होकर (मादयस्व) = हमें आनन्दित कर । 'हम ज्ञान की रुचि वाले बनें' यही सरस्वती का हृदयों में आसीन होना है। जब कभी भी यह हो सका, हम एक विशिष्ट आनन्द का अनुभव करेंगे। [४] 'हम स्वाध्याय की रुचि वाले बनें' इसके लिये तू (अस्मे) = हमारे लिये (अनमीवा) = सब प्रकार के रोगों से रहित (इषः) = अन्नों को (आधेहि) = स्थापित कर । इन अन्नों का सेवन करते हुए हम सत्त्वशुद्धि के द्वारा, ज्ञान का वर्धन करनेवाले बनें।
Connotation: - भावार्थ- हमारा जीवन स्वाध्याय सम्पन्न हो। हम सात्त्विक अन्नों का प्रयोग करें ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (सरस्वति देवि) हे स्तुतिवाणि ! देवि ! (या) यैषा त्वम् (पितृभिः सरथं ययाथ) मनोभावैः सह “मनः पितरः” [श०१४।४।३।१३] समानरमणीयं परमात्मानं प्रति गच्छसि (स्वधाभिः-मदन्ती) तत्रत्यैः-आनन्दरसैः “स्वधायै त्वेति रसाय त्वेत्येवैतदाह” [श०५।४।३।७] माद्यन्ती (अस्मिन् बर्हिषि-आसद्य) अस्मिन् मानसे ज्ञानयज्ञे “बर्हिषि-मानसे ज्ञानयज्ञे” [यजु०३१।९ दयानन्दः] विराज्य (मादयस्व) अस्मान् हर्षय (अस्मे-अनमीवाः-इषः-आधेहि) अस्मभ्यं रोगवर्जिताः-रोगवर्जकान् कमनीयभोगान्-आधारय प्रापय ॥८॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O divine Sarasvati, cosmic voice of divinity, who radiate and expand on the rays of light and rejoice with homage of faith and devotion and the inner vibrations of mind and soul, pray come, abide in this inner seat of mind and consciousness, bless us with divine joy and bring us food and energy free from sin and pollution for the enlightenment of mind and soul.