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आपो॑ अ॒स्मान्मा॒तर॑: शुन्धयन्तु घृ॒तेन॑ नो घृत॒प्व॑: पुनन्तु । विश्वं॒ हि रि॒प्रं प्र॒वह॑न्ति दे॒वीरुदिदा॑भ्य॒: शुचि॒रा पू॒त ए॑मि ॥

English Transliteration

āpo asmān mātaraḥ śundhayantu ghṛtena no ghṛtapvaḥ punantu | viśvaṁ hi ripram pravahanti devīr ud id ābhyaḥ śucir ā pūta emi ||

Mantra Audio
Pad Path

आपः । अ॒स्मान् । मा॒तरः॑ । शु॒न्ध॒य॒न्तु॒ । घृ॒तेन॑ । नः॒ । घृ॒त॒ऽप्वः॑ । पु॒न॒न्तु॒ । विश्व॑म् । हि । रि॒प्रम् । प्र॒ऽवह॑न्ति । दे॒वीः । उत् । इत् । आ॒भ्यः॒ । शुचिः॑ । आ । पू॒तः । ए॒मि॒ ॥ १०.१७.१०

Rigveda » Mandal:10» Sukta:17» Mantra:10 | Ashtak:7» Adhyay:6» Varga:24» Mantra:5 | Mandal:10» Anuvak:2» Mantra:10


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (मातरः-आपः-अस्मान् शुन्धयन्तु) माता के समान स्नेह शान्तिप्रद, जीवनकला निमार्ण करनेवाले जन या आप्त विद्वान् हमें पवित्र करते हैं (घृतप्वः-घृतेन नः पुनन्तु) घृत से सींचते हुए जैसे पवित्र करते हुए जल अथवा तेज से पवित्र करनेवाले आप्त विद्वान् हमें पवित्र करें (विश्वं रिप्रं देवीः प्रवहन्ति) सारे मल दोष को दिव्यगुणवाले जल तथा आप्त विद्वान् पाप को दूर बहाते हैं-दूर करते हैं (इत्) अनन्तर (आभ्यः-“आपूतः शुचिः-उत्-एमि) इनके साथ भलीभाँति सङ्गत होकर पवित्र निर्मल या निष्पाप होता हुआ उन्नत हूँ ॥१०॥
Connotation: - जल अपने स्नेह से तथा आप्त विद्वान् अपने तेज-ज्ञान से हमें पवित्र किया करते हैं। उनसे यथोचित लाभ लेकर मानव निर्मल व निष्पाप हो जाते हैं और उन्नति के पथ को प्राप्त करते हैं ॥१०॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'सरस्वती' के जल में स्नान

Word-Meaning: - [१] गत मन्त्रों में सरस्वती का उल्लेख था । यह ज्ञान की धारा व ज्ञान नदी गुरु-शिष्य परम्परा से आगे और आगे प्रवाहित होती है । 'इस ज्ञाननदी के जल हमारे जीवनों को पवित्र करें' यह प्रार्थना प्रस्तुत मन्त्र में की गई है। (मातरः) = मातृवत् हित को करनेवाले अथवा हमारे जीवन के स्वास्थ्य का निर्माण करनेवाले (आपः) = इस सरस्वती नदी के जल (अस्मान्) = हमें (शुन्धयन्तु) = शुद्ध कर डालें। ज्ञान के समान पवित्र करनेवाली अन्य वस्तु नहीं है । [२] (घृतप्वः) = [घृक्षरण- दीप्त्योः] मलों के क्षरण व ज्ञान की दीप्ति से ये जल पवित्र करनेवाले हैं। ये (घृतेन) = मलों के दूरीकरण के द्वारा (नः पुनन्तु) = हमें पवित्र करें। इन ज्ञान जलों से हमारे सब अंग पवित्र हो जाएँ । बाहर की पवित्रता जलों से होती है तो अन्तः पवित्रता इन ज्ञान जलों के बिना नहीं हो सकती । [३] (देवी:) = दिव्य गुणों को जन्म देनेवाले अथवा जीवन को प्रकाशमय करनेवाले ये ज्ञानजल (हि) = निश्चय से (विश्वं रिप्रम्) = सब मलों व दोषों को (प्रवहन्ति) = बहा ले जाते हैं। इन ज्ञान जलों से पापों के मल धुल जाते हैं। [४] इन ज्ञान जलों में गोता लगाने के बाद (शुचिः) = पवित्र हुआ- हुआ (आपूतः) = अंग-प्रत्यंग में शुद्ध हुआ हुआ (आभ्यः) = इन से (उत् एमि) = ऊपर आता हूँ। वैदिक संस्कृति के अनुसार ब्रह्मचर्याश्रम में हम इन ज्ञान जलों में स्नान करके, शुद्ध होकर, गृहस्थ में आते हैं, और इसी कारण हमारा गृहस्थ मलिन नहीं हो पाता । पुनः वानप्रस्थ में 'स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्'-नित्य स्वाध्याय में युक्त होकर ज्ञान जलों में स्नान चलता है और पवित्र होकर, सब मलासंगों से रहित होकर हम संन्यस्त होते हैं और प्राजापत्य यज्ञ में प्रवृत्त हो जाते हैं। यह यज्ञ ही अन्ततः हमें प्रजापति की गोद में विलीन करनेवाला होता है ।
Connotation: - भावार्थ- सरस्वती नदी के जल हमारे जीवन की पूर्ण पवित्रता को सिद्ध करते हैं ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (मातरः-आपः-अस्मान् शुन्धयन्तु) मातृवत् स्नेहशान्तिप्रदाः, जीवनकलानिर्मात्र्यः-आपः-आप्तविद्वांसो वा “मनुष्या वा आपश्चन्द्राः” [श०७।३।१।२७] “आपः-आप्ताः” [यजु०६।२७ दयानन्दः] अस्मान् शोधयन्तु-पवित्रीकुर्वन्तीति भावः “शुन्ध शौचकर्मणि” [चुरादिः] (घृतप्वः-घृतेन नः पुनन्तु) सेचनेन पवित्रीकुर्वत्य आपः, यद्वा तेजसा पवित्रीकुर्वन्त आप्तविद्वांसः “तेजौ वै घृतम्” [मै०१।६।८] सेचनधर्मेण “घृ सेचने” [भ्वादिः] “नपुंसके भावे क्तः” [अष्टा०३।३।११४] तेजसा वाप्तजनाः पवित्रीकुर्वन्त्वस्मान् (विश्वं हि रिप्रं देवीः प्रवहन्ति) सर्वं ह्यमेध्यं मलं “तद्यदमेध्यं रिप्रं तत्” [श०३।१।२।११] दिव्यगुणा आपो दूरीकुर्वन्ति, उपदेशेन सर्वपापान् पृथक् कुर्वन्त्याप्ता दिव्यगुणाः “रिप्रं पापनाम” [निरु०४।२१] (इत्) अनन्तरम् (आभ्यः “आभिः” आपूतः शुचिः-उत्-एमि) एतैः सह सङ्गत्य समन्तात् प्रगतिप्राप्तः पवित्रो निर्मलो निष्पापो वा सन्नुत्सहे-उच्चत्वं प्राप्नोमि वा ॥१०॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - May the fluid and vibrant currents of cosmic energy, original mother source of nature’s dynamics of evolution, which, divine and inviolable, soaked in goodness and grace, wash away the entire sin, evil and pollution of life, purify and sanctify us with sweetness and beauty of manners and culture. Thus purified and sanctified, I rise and go on in life.