'सरस्वती' के जल में स्नान
Word-Meaning: - [१] गत मन्त्रों में सरस्वती का उल्लेख था । यह ज्ञान की धारा व ज्ञान नदी गुरु-शिष्य परम्परा से आगे और आगे प्रवाहित होती है । 'इस ज्ञाननदी के जल हमारे जीवनों को पवित्र करें' यह प्रार्थना प्रस्तुत मन्त्र में की गई है। (मातरः) = मातृवत् हित को करनेवाले अथवा हमारे जीवन के स्वास्थ्य का निर्माण करनेवाले (आपः) = इस सरस्वती नदी के जल (अस्मान्) = हमें (शुन्धयन्तु) = शुद्ध कर डालें। ज्ञान के समान पवित्र करनेवाली अन्य वस्तु नहीं है । [२] (घृतप्वः) = [घृक्षरण- दीप्त्योः] मलों के क्षरण व ज्ञान की दीप्ति से ये जल पवित्र करनेवाले हैं। ये (घृतेन) = मलों के दूरीकरण के द्वारा (नः पुनन्तु) = हमें पवित्र करें। इन ज्ञान जलों से हमारे सब अंग पवित्र हो जाएँ । बाहर की पवित्रता जलों से होती है तो अन्तः पवित्रता इन ज्ञान जलों के बिना नहीं हो सकती । [३] (देवी:) = दिव्य गुणों को जन्म देनेवाले अथवा जीवन को प्रकाशमय करनेवाले ये ज्ञानजल (हि) = निश्चय से (विश्वं रिप्रम्) = सब मलों व दोषों को (प्रवहन्ति) = बहा ले जाते हैं। इन ज्ञान जलों से पापों के मल धुल जाते हैं। [४] इन ज्ञान जलों में गोता लगाने के बाद (शुचिः) = पवित्र हुआ- हुआ (आपूतः) = अंग-प्रत्यंग में शुद्ध हुआ हुआ (आभ्यः) = इन से (उत् एमि) = ऊपर आता हूँ। वैदिक संस्कृति के अनुसार ब्रह्मचर्याश्रम में हम इन ज्ञान जलों में स्नान करके, शुद्ध होकर, गृहस्थ में आते हैं, और इसी कारण हमारा गृहस्थ मलिन नहीं हो पाता । पुनः वानप्रस्थ में 'स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्'-नित्य स्वाध्याय में युक्त होकर ज्ञान जलों में स्नान चलता है और पवित्र होकर, सब मलासंगों से रहित होकर हम संन्यस्त होते हैं और प्राजापत्य यज्ञ में प्रवृत्त हो जाते हैं। यह यज्ञ ही अन्ततः हमें प्रजापति की गोद में विलीन करनेवाला होता है ।
Connotation: - भावार्थ- सरस्वती नदी के जल हमारे जीवन की पूर्ण पवित्रता को सिद्ध करते हैं ।