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प्र॒जाप॑ति॒र्मह्य॑मे॒ता ररा॑णो॒ विश्वै॑र्दे॒वैः पि॒तृभि॑: संविदा॒नः । शि॒वाः स॒तीरुप॑ नो गो॒ष्ठमाक॒स्तासां॑ व॒यं प्र॒जया॒ सं स॑देम ॥

English Transliteration

prajāpatir mahyam etā rarāṇo viśvair devaiḥ pitṛbhiḥ saṁvidānaḥ | śivāḥ satīr upa no goṣṭham ākas tāsāṁ vayam prajayā saṁ sadema ||

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Pad Path

प्र॒जाऽप॑तिः । मह्य॑म् । ए॒ताः । ररा॑णः । विश्वैः॑ । दे॒वैः । पि॒तृऽभिः॑ । स॒म्ऽवि॒दा॒नः । शि॒वाः । स॒तीः । उप॑ । नः॒ । गो॒ऽस्थम् । आ । अ॒क॒रित्य॑कः । तासा॑म् । व॒यम् । प्र॒ऽजया॑ । सम् । स॒दे॒म॒ ॥ १०.१६९.४

Rigveda » Mandal:10» Sukta:169» Mantra:4 | Ashtak:8» Adhyay:8» Varga:27» Mantra:4 | Mandal:10» Anuvak:12» Mantra:4


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (प्रजापतिः) प्रजापालक परमात्मा (मह्यम्) मेरे लिए (एताः-रराणः) इन गौवों को देता हुआ (विश्वैः) समस्त (देवैः-पितृभिः) विद्वानों और पालकजनों के साथ (संविदानः) एक विचार को प्राप्त करता हुआ (शिवाः सतीः) कल्याणकारी होती हुई गौवों को (नः-गोष्ठम्) हमारे गोसदन को (उप-अकः) उपकृत करे-पूरा करे (तासां प्रजया) उनकी प्रजाओं के साथ (वयं सं सदेम) हम भलीभाँति बसें ॥४॥
Connotation: - परमात्मा मनुष्यमात्र के लिए गौवों को प्रदान करता है, विद्वानों के लिए पालकजनों के लिए और सर्वसाधारण जनों के लिए भी, इसलिए कि ये सबके लिए कल्याणकारी हैं, इन्हें अपने-अपने गोसदन में रखकर रक्षा करनी चाहिये ॥४॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

देव- पितर

Word-Meaning: - [१] (प्रजापतिः) = सब प्रजाओं का रक्षक प्रभु (मह्यम्) = मेरे लिये (एताः) = इन गौवों को (रराण:) = देता है । इन गौवों के द्वारा (विश्वैः देवैः) = सब देवों से तथा (पितृभिः) = पितरों से (संविदानः) = [विद् लाभे] हमें सम्यक् युक्त करता है। अर्थात् इन गोदुग्धों के सेवन से हमारे अन्दर देववृत्ति व पितृवृत्ति का उदय होता है, हम प्रायेण ज्ञान-प्रधान जीवन बिताते हैं और रक्षणात्मक कार्यों में प्रवृत्त होते हैं । [२] इन (शिवाः सतीः) = कल्याणकर होती हुई गौवों को (न:) = हमारे (गोष्ठं उप आकः) = गोष्ठ में प्राप्त कराइये। (वयम्) = हम (तासाम्) = उन गौवों के (प्रजया) = प्रजाओं के साथ (सं सदेम) = सम्यक्तया अपने घरों में विराजमान हों। इन गौवों से हमारा घर नीरोगता, निर्मलता व तीव्र बुद्धि को प्राप्त करता हुआ चमक उठे। हमारा जीवन अधिकाधिक सुन्दर बने ।
Connotation: - भावार्थ- गोदुग्ध के सेवन से देववृत्ति व पितृवृत्ति का उदय होता है। घर सब तरह से उत्तम बनता है । सम्पूर्ण सूक्त गोदुग्ध के सेवन के महत्त्व को व्यक्त कर रहा है। इस गोदुग्ध का सेवन हमारे जीवन को दीप्त बनाता है, सूर्य की तरह हम चमकते हैं। यह सूर्य की तरह चमकनेवाला 'विभ्राट् सौर्य:' अगले सूक्त का ऋषि है। इसके लिये प्रभु निर्देश करते हैं-

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (प्रजापतिः) प्रजापालकः परमात्मा (मह्यम्) मदर्थम् (एताः-रराणः) इमा गाः प्रयच्छन् (विश्वैः-देवैः पितृभिः संविदानः) समस्तैर्विद्वद्भिः पालकजनैश्च सहैकमत्यं प्राप्नुवन् (शिवाः सतीः) शिवाः सत्यः (नः गोष्ठम्) अस्माकं गोष्ठम् (उप-अकः) उपाकरोतु-पूरयतु (तासां प्रजया वयं सं सदेम) तासां गवां प्रजया सह वयं सम्यक् वसेम ॥४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Prajapati, lord protector, sustainer and promoter of the people with all divine energies of nature’s brilliance and nourishment, and the nation’s food minister with active consultation and advice of all brilliant scholars and nutrition experts of the land, give us these cows with joyous enthusiasm and bring to our cow stall such cows as are the best and most abundant in nourishing milk. May we continue to benefit from the cow’s progeny of excellent breed.