क्रव्याद अग्नि का निर्वासन
Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार शरीर को प्रिय व अमृत बनाने के लिये आवश्यक है कि हम आग्नेय भोजनों को न करके सोम्य भोजनों के ही करनेवाले हों । तामस भोजन को अपने जीवन में स्थान न देकर वानस्पतिक भोजनों के ही करनेवाले बनें । इसी भाव को वेद की काव्यमय भाषा में इस प्रकार कहा गया है कि ('क्रव्यादम्') = मांस को खानेवाली (अग्निम्) = अग्नि को (दूरं प्रहिणोमि) = मैं दूर भेजता हूँ। हमारी जाठराग्नि में कभी भी मांस की आहुति न दी जाए। मांस 'हव्य' पदार्थ नहीं है । [२] यह क्रव्याद अग्नि तो (यमराज्ञः) = यमराजा का है, अर्थात् इस क्रव्याद अग्नि का सम्बन्ध मृत्यु की देवता से है। यह मांस भोजन मृत्यु का, रोगों का कारण बनता है। (रिप्रवाह:) = दोषों का दहन करनेवाला यह क्रव्याद अनि (गच्छतु) = हमारे से सुदूर प्रदेशों में जाये। हमारे से मांस भोजन दूर ही रहे । [३] (इतर:) = मांस भोजन से भिन्न वानस्पतिक भोजनों वाला (अयम्) = यह (जातवेदाः) = उत्पन्न प्रज्ञानों वाला अग्नि (एव) = ही (इह) = यहाँ हमारे जीवनों में हो। हम सदा सात्त्विक वानस्पतिक भोजनों को ही करनेवाले हों। यह भोजन ही हमें आहार शुद्धि के द्वारा सत्त्व-शुद्धि वाला बनायेगा । हमारे शुद्ध अन्तःकरणों में ज्ञान का प्रकाश होगा। [४] इसलिए (प्रजानन्) = एक समझदार पुरुष (देवेभ्यः) = दिव्यगुणों की उत्पत्ति के लिए (हव्यं वहतु) = हव्य पदार्थों को ही इस जाठराग्नि में प्राप्त करानेवाला हो। हम कभी भी मांस को भोजन न बनायें, यह अयज्ञिय है, हव्य नहीं है। मांस भोजन से क्रूरता व स्वार्थ आदि की भावनाओं का ही विकास होता है नकि दिव्यभावों का । दिव्यभावनाओं की उत्पत्ति के लिये हव्य पदार्थ ही हितकर हैं।
Connotation: - भावार्थ- हम मांस को सर्वथा छोड़कर यज्ञिय पवित्र वानस्पतिक भोजनों के ही करनेवाले बनें। मांस भोजन दोषों को पैदा करता है, हव्य पदार्थों का भक्षण सत्त्व- -शुद्धि द्वारा ज्ञान व दिव्यगुणों की वृद्धि करनेवाला है ।