पुनः पितरों के प्रति अपना अर्पणपरिव्रजित होने की तैयारी
Word-Meaning: - [१] इस सूक्त के प्रथम मन्त्र में माता-पिता ने सन्तानों को पितरों [= आचार्यों] के प्रति सौंपा था। आचार्यों ने उसे ज्ञान परिपक्व बनाकर घर वापिस भेजा था । यहाँ घरों में देवों के साथ अनुकूलता रखते हुए यह स्वस्थ शरीर बनाया और प्रभु की उपासना द्वारा हृदय में प्रभु का दर्शन करनेवाला बना। इस प्रकार गृहस्थ को सुन्दरता से समाप्त करके हे (अग्ने) = प्रगतिशील जीव ! तू (पुनः) = फिर वनस्थ होने के समय (पितृभ्यः) = वनस्थ पितरों के लिये (अवसृज) = अपने को देनेवाला बन । उनके चरणों में अपना तू अर्पण कर । उनके समीप रहता हुआ ही तू फिर से साधना करके जीवन के अन्तिम प्रयाण के लिये तैयार हो सकेगा । [२] तू उस पितर के लिये अपने को अर्पित कर (य:) = जो (ते) = तेरे द्वारा (आहुतः) = आहुत हुआ हुआ, अर्थात् जिसके प्रति तूने अपना अर्पण किया है, ऐसा वह (स्वधाभिः) = आत्मतत्त्व के धारण के हेतु से (चरति) = सब क्रियाएँ करता है । अर्थात् उन पितरों का प्रयत्न यह होता है कि तुझे आत्मदर्शन के मार्ग पर डाल दें। [३] अब आत्मदर्शन की योग्यता प्राप्त करके तू प्रव्रजित होता है और (आयुः) = उत्कृष्ट जीवन को, सशक्त व उत्तम जीवन को (वसानः) = धारण करता हुआ, (शेषः उपवेतु) = [शेषस्= अवशिष्ट] अवशिष्ट भोजन को ही तू प्राप्त करनेवाला हो। संन्यासी ने भिक्षा माँगनी है, परन्तु माँगनी तब है जब कि 'विद्धूमे सन्नमुसले ' - रसोई में से धूआं निकलना बन्द हो चुका हो और मुसल व्यापार भी समाप्त हो चुका हो। इस समय तक सब घर के व्यक्ति खा-पी चुके होंगे और बची-खुची ही रोटी भिक्षा में प्राप्त होगी । यही 'शेष: ' है । इसके लेने में किसी पर यह संन्यासी बोझ नहीं बनता। [४] इस प्रकार गृहस्थ्य पर कम से कम बोझ होता हुआ यह (जातवेदः) = विकसित ज्ञानवाला परिव्राजक (तन्वा) = विस्तृत शक्तियों वाले शरीर से (संगच्छताम्) = संगत हो। इसका शरीर क्षीणशक्ति न होकर बढ़ी हुई शक्तियों वाला हो। इसका जीवन परिपक्व फल की तरह अधिक सुन्दर प्रतीत हो ।
Connotation: - भावार्थ-गृहस्थ के बाद वनस्थ होकर यह उन पितरों के सम्पर्क में आये जो कि इसे आत्मदर्शन के मार्ग पर ले चलें । संन्यास होकर यह बचे हुए अन्न का भिक्षा में प्राप्त करे, स्वस्थ सुन्दर शरीर वाला हो ।