Word-Meaning: - [१] (अ - सपत्ना) = मैं रोगरूप सपत्नों से, शत्रुओं से रहित होती हूँ । (सपत्नघ्नी) = इन रोगों व वासनारूप शत्रुओं का हनन करनेवाली बनती हूँ । जयन्ती सदा विजयशील तथा (अभिभूवरी) = वासनारूप शत्रुओं को अभिभूत करनेवाली होती हूँ। [२] इन (अन्यासाम्) = मेरे से भिन्न, मेरी शत्रुभूत वासनाओं के (वर्चः) = तेज को (आवृक्षम्) = मैं काटनेवाली होती हूँ । उसी प्रकार इनके तेज को मैं विनष्ट करती हूँ (इव) = जैसे कि (अस्थेयसाम् राधा) = अस्थिर वृत्तिवालों के ऐश्वर्य को । 'राध:' शब्द का व्यापक अर्थ सफलता है। उस अर्थ को लेने पर भाव यह होगा कि जैसे अस्थिर वृत्तिवालों की सफलता विनष्ट होती है, इसी प्रकार इन वासनाओं की शक्ति को मैं विनष्ट करती हूँ । स्थिर वृत्तिवाली बनकर मैं अपने इस शत्रु संहार रूप कार्य में भी सफलता को प्राप्त करती हूँ ।
Connotation: - भावार्थ - एक आदर्श माता रोग व वासना रूप शत्रुओं को अभिभूत करके, स्थिर वृत्तिवाली बनकर अपने सन्तान निर्माणरूप कार्य में सफल होती है ।