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जोषा॑ सवित॒र्यस्य॑ ते॒ हर॑: श॒तं स॒वाँ अर्ह॑ति । पा॒हि नो॑ दि॒द्युत॒: पत॑न्त्याः ॥

English Transliteration

joṣā savitar yasya te haraḥ śataṁ savām̐ arhati | pāhi no didyutaḥ patantyāḥ ||

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Pad Path

जोष॑ । स॒वि॒तः॒ । यस्य॑ । ते॒ । हरः॑ । श॒तम् । स॒वान् । अर्ह॑ति । पा॒हि । नः॒ । दि॒द्युतः॑ । पत॑न्त्याः ॥ १०.१५८.२

Rigveda » Mandal:10» Sukta:158» Mantra:2 | Ashtak:8» Adhyay:8» Varga:16» Mantra:2 | Mandal:10» Anuvak:12» Mantra:2


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (सवितः) हे प्रेरक परमात्मन् ! (जोष) हमारी स्तुति को सेवन कर (यस्य ते) जिस तेरा (हरः) तेज प्रभाव-प्रताप (शतं सवान्) बहुतेरे चन्द्र आदि पिण्डप्रदेशों को (अर्हति) स्ववश में करने को समर्थ है (पतन्त्याः) नीचे गिरती हुई (दिद्युतः) विद्युत् से (नः) हमारी (पाहि) रक्षा कर ॥२॥
Connotation: - परमात्मा का तेज-प्रताप आकाश के अनन्त चन्द्र आदि पिण्डप्रदेशों को अपने वश में रखता है और आकाश से नीचे गिरती हुई विद्युत् से रक्षा करने में समर्थ है, अतः उसके प्रति आस्तिक भाव रखना चाहिए ॥२॥ 
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

शतवार्षिक यज्ञ - जीवन

Word-Meaning: - [१] हे (सवितः) = हमारे में प्राणशक्ति को प्रेरित करनेवाले सूर्य ! (जोषा) = तू हमारा प्रीतिपूर्वक सेवन करनेवाला हो। हम सूर्य के प्रिय हों, अधिक से अधिक सूर्य किरणों के सम्पर्क में जीवन को बिताने का प्रयत्न करें। तेरे लिये हम प्रिय हों (यस्य ते) = जिस तेरा (हरः) = सब रोगों का हरण करनेवाला तेज शतं सवान् सौ यज्ञों के (अर्हति) = योग्य होता है। जीवन का एक-एक वर्ष ही एक-एक यज्ञ है। सूर्य किरणों के सम्पर्क में आते हुए हम सौ वर्ष तक जीवन यज्ञ को चलानेवाले हों । [२] हे सवितः ! तू (नः) = हमें (पतन्त्याः) = हमारे पर विचरनेवाले (दिद्युतः) = [दो अवखण्डने ] घातक रोग से (पाहि) = बचाये । रोगरूप विद्युत् के पतन से यह सूर्य हमारा रक्षण करता है ।
Connotation: - भावार्थ- सूर्य किरणों के सम्पर्क में निवास हमें रोगों से बचाकर दीर्घ जीवन प्राप्त कराता है ।
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (सवितः जोष) हे प्रेरक परमात्मन् ! अस्माकं स्तुतिं सेवस्य (यस्य ते हरः) यस्य तव तेजः प्रभावः (शतं सवान्-अर्हति) बहून् चन्द्रादीन् पिण्डप्रदेशान् स्ववशं कर्तुं समर्थो भवति (पतन्त्याः-दिद्युतः-नः पाहि) निपतन्त्याः खलु विद्युतोऽस्मान् रक्ष ॥२॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O Savita, lord creator and giver of light and life, O sun, whose receptive and radiative refulgence is worthy of a hundred yajnic activities on earth and other planets by human and natural forces, pray accept our homage and prayer and protect and save us from the flying and falling strikes of light and lightning.