Word-Meaning: - [१] हे (अग्ने) = परमात्मन् ! (रयिं आभर) = हमें ऐश्वर्य से परिपूर्ण करिये। जो ऐश्वर्य (स्थूरम्) = [स्थूलं] प्रवृद्ध [बढ़ा हुआ] है, (पृथुम्) = विस्तृत है, (गोमन्तम्) = उत्तम गौवोंवाला है तथा (अश्विनम्) = प्रशस्त अश्वोंवाला है। गौवें दूध से बुद्धि की सात्त्विकता के द्वारा ज्ञानवृद्धि का कारण होती हैं, घोड़े शक्ति की वृद्धि का । इतना धन प्रभु हमें दें कि हम उत्तम गौवों व अश्वोंवाले बन पायें। [२] (खं अधि) = आप हमारी इन्द्रियों को कान्तिवाला व गतिवाला करिये। नमक तेल ईंधन की परेशानी के न होने पर वे सब इन्द्रियाँ अपना कार्य ठीक प्रकार से करनेवाली हों तथा चमकनेवाली हों, सशक्त बनी रहें। इस धन के द्वारा आप पणिम् = हमारे सब व्यवहार को वर्तया ठीक से प्रवृत्त कराइये, अर्थात् इतना धन दीजिये कि हमारे सब व्यवहार ठीक प्रकार चलते जायें।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु हमें इतना धन दें जिससे कि हम उत्तम गौवों व घोड़ोंवाले होते हुए सब इन्द्रियों को दीप्त व सशक्त बना सकें और हमारे सब व्यवहार ठीक प्रकार से सिद्ध हों ।