Word-Meaning: - [१] [नीथ:-पथप्रदर्शन glsiding] (सहस्रणीथा:) = शतश: पुरुषों को मार्गदर्शन करानेवाले (कवयः) = ज्ञानी पुरुष, (ये) = जो (सूर्यं गोपायन्ति) = अपने मस्तिष्करूप द्युलोक में ज्ञान सूर्य का रक्षण करते हैं, उन (ऋषीन्) = तत्त्वद्रष्टा ज्ञानी पुरुषों को जो (तपस्वतः) = तपस्यामय जीवनवाले हैं, उन (तपोजान्) = तप से जिन्होंने अपनी शक्तियों का विकास किया है उन पुरुषों को हे (यम) = आचार्य ! यह बालक (अपिगच्छतात्) = प्राप्त होनेवाला हो। [२] इस बालक का इस प्रकार का शिक्षण हो कि यह अपने जीवन को तपस्या के द्वारा उत्तम परिपाकवाला करके औरों के लिये मार्गदर्शन का कार्य करे।
Connotation: - भावार्थ- सन्तानों को हम तपस्वी ऋषि तुल्य जीवनवाला बनायें । यह सूक्त सन्तानों के आदर्श निर्माण को हमारे सामने उपस्थित करता है। जिनका इस प्रकार निर्माण होता है वे भारद्वाजः = अपने में सदा त्याग को स्थापित करनेवाले [वाज = saerifice] 'शिरिम्बिठ'= [विठम् अन्तरिक्षम्, इत हिंसायाम्] हृदयान्तरिक्ष में वासना को विनष्ट करनेवाले बनते हैं। ये सदा दान की वृत्तिवाले होते हुए कहते हैं कि-