Word-Meaning: - [१] हे आत्मविद्ये! जो तू (उत्तानपर्णे) = ऊर्ध्वमुखपर्णोवाली हैं, अर्थात् हमें सदा उन्नति की ओर ले चलनेवाली व हमारा पालन व पूरण करनेवाली है । (सुभगे) = उत्तम ज्ञान व अनासक्ति की भावना को उत्पन्न करनेवाली है [भगः ज्ञान, वैराग्य] । (देवजूते) = देवों - विद्वानों के द्वारा हमारे में प्रेरित होती है, अर्थात् विद्वानों से ही जिसका ज्ञान दिया जाता है। (सहस्वति) = शत्रुमर्षक बलवाली, जो हमारे काम-क्रोध आदि शत्रुओं को कुचल देती है। ऐसी आत्मविद्ये! तू (मे) = मेरी (सपत्नीम्) = सपत्नीभूत भोगवृत्ति को (पराधम) = सन्तप्त करके दूर कर दे। [२] आत्मविद्या से भोगवृत्ति क्षीण होती है, मनुष्य प्रभु-प्रवण बनता है। वह यही प्रार्थना करता है कि (केवलम्) = उस आनन्द में विचरनेवाले (पतिम्) = सर्वरक्षक प्रभु को (मे कृधि) = मेरा कर । मैं प्रभु प्राप्ति की ही कामनावाला बनूँ । सांसारिक कामनाओं से ऊपर उहूँ।
Connotation: - भावार्थ - आत्मविद्या हमें ऊपर ही ऊपर ले चलती है। यह हमारे में शत्रुओं के मर्षण करनेवाले बल को पैदा करती है।