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यं सु॑प॒र्णः प॑रा॒वत॑: श्ये॒नस्य॑ पु॒त्र आभ॑रत् । श॒तच॑क्रं॒ यो॒३॒॑ऽह्यो॑ वर्त॒निः ॥

English Transliteration

yaṁ suparṇaḥ parāvataḥ śyenasya putra ābharat | śatacakraṁ yo hyo vartaniḥ ||

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Pad Path

यम् । सु॒ऽप॒र्णः । प॒रा॒ऽवतः॑ । श्ये॒नस्य॑ । पु॒त्रः । आ । अभ॑रत् । श॒तऽच॑क्रम् । यः । अ॒ह्यः॑ । व॒र्त॒निः ॥ १०.१४४.४

Rigveda » Mandal:10» Sukta:144» Mantra:4 | Ashtak:8» Adhyay:8» Varga:2» Mantra:4 | Mandal:10» Anuvak:11» Mantra:4


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यं शतचक्रम्) जिस सौ वर्ष आयु करनेवाले (सुपर्णम्) सुष्ठुपालक वीर्य पदार्थ को (परावतः) प्रेरित किए हुए (श्येनस्य) प्रशंसनीय आत्मा का (पुत्रः) पुत्रसमान शिवसंकल्प (आ अभरत्) धारण करता है (यः) जो (अह्यः) न हीन करने योग्य-अत्याज्य-ग्राह्य धारण करने योग्य (वर्तनिः) जीवन का मार्ग है ॥४॥
Connotation: - ब्रह्मचर्य मानव की सौ वर्ष आयु पूर्णायु करनेवाला है, इसे परमात्मा से प्रेरित आत्मा का शिवसंकल्प धारण करता है-शिवसंकल्प से धारण किया जाता है, यह जीवन में धारण करने योग्य है, जीवन का सच्चा मार्ग बनाता है ॥४॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सुपर्णः, श्येनस्य पुत्रः

Word-Meaning: - [१] (यम्) = जिस सोम को (सुपर्ण:) = उत्तमता से अपना पालन व पूरण करनेवाला, (श्येनस्य पुत्रः) = [श्यैङ्गतौ] गतिशील का पुत्र, अर्थात् खूब क्रियाशील जीवनवाला व्यक्ति (परावतः) = सुदूर देश से (आभरत्) = शरीर में चारों ओर धारण करता है। यह सोम अन्न में निवास करता है। उस अन्न को जब हम खाते हैं, तो पहले रस उत्पन्न होता है। रस से रुधिर, रुधिर से मांस, मांस से मेदस्, मेदस् से अस्थि, अस्थि से मज्जा तथा मज्जा से इस वीर्य शक्ति की उत्पत्ति होती है । एवं सुदूर देश से सातवीं मंजिल में इसका लाभ होता है। [२] यह सोम सुरक्षित होने पर (शतचक्रम्) = सौ वर्ष के आयुष्य को करनेवाला है तथा यह वह है (यः) = जो कि (अह्यः) = [अहे:- आहन्तुः-सर्पस्य= कुटिलताया] कुटिलता का (वर्जनिः) = मुख मोड़ देनेवाला है, अर्थात् कुटिलता की वृत्ति को हमारे से दूर करनेवाला है ।
Connotation: - भावार्थ- सोम का रक्षण क्रियाशील पुरुष ही कर पाता है। सुरक्षित सोम सौ वर्ष के 'आयुष्य को देनेवाला व कुटिल वृत्ति को दूर करनेवाला है ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यं शतचक्रं सुपर्णम्) यं शतवर्षायुष्करं सुष्ठु पालकं वीर्यपदार्थम् “वीर्यं वै सुपर्णः” [श० ६।७।२।६] (परावतः श्येनस्य पुत्रः) प्रेरितवतः “परावतः प्रेरितवतः” [निरु० ७।२६] प्रशंसनीयगतिकस्यात्मनः पुत्रवद्वर्तमानः शिवसङ्कल्पः (आ अभरत्) समन्ताद् धारयति (यः-अह्यः-वर्तनिः) योऽहेयोऽत्याज्यो ग्राह्य एव जीवनमार्गः ॥४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Soma, which Vayu, cosmic energy, child of all pervasive space, bears and carries from far off solar regions, is performer of a hundred divine acts of nature and it is the very life of the cloud and indestructible vitality of life.