Go To Mantra
Viewed 534 times

ऊर्जो॑ नपाज्जातवेदः सुश॒स्तिभि॒र्मन्द॑स्व धी॒तिभि॑र्हि॒तः । त्वे इष॒: सं द॑धु॒र्भूरि॑वर्पसश्चि॒त्रोत॑यो वा॒मजा॑ताः ॥

English Transliteration

ūrjo napāj jātavedaḥ suśastibhir mandasva dhītibhir hitaḥ | tve iṣaḥ saṁ dadhur bhūrivarpasaś citrotayo vāmajātāḥ ||

Mantra Audio
Pad Path

ऊर्जः॑ । न॒पा॒त् । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ । सु॒श॒स्तिऽभिः॑ । मन्द॑स्व । धी॒तिऽभिः॑ । हि॒तः । त्वे इति॑ । इषः॑ । सम् । द॒धुः॒ । भूरि॑ऽवर्पसः । चि॒त्रऽऊ॑तयः । वा॒मऽजा॑ताः ॥ १०.१४०.३

Rigveda » Mandal:10» Sukta:140» Mantra:3 | Ashtak:8» Adhyay:7» Varga:28» Mantra:3 | Mandal:10» Anuvak:11» Mantra:3


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (ऊर्जः) बल के (नपात्) न गिरानेवाले (जातवेदः) जातमात्र-उत्पन्न मात्र को जानने योग्य परमात्मन् ! (सुशस्तिभिः) उत्तम स्तुतियों से (धीतिभिः) सत्कर्मों-सदाचरणों से (हितः) अपने अन्दर स्थिर किया हुआ (मन्दस्व) हमें हर्षित कर (भूरिवर्पसः) बहुत रूपोंवाले (चित्रोतयः) अद्भुत रक्षावाले (वामजाताः) वननीय गुणों से प्रसिद्ध जन (त्वे-इषः) तेरे  अन्दर अपनी कामनाओं को (सन्दधुः) समर्पित करते हैं, तू उन्हें प्रसन्न कर ॥३॥
Connotation: - परमात्मा बल को न गिरानेवाला है, सबका ज्ञाता है, जो उत्तम स्तुतियों सदाचरणों द्वारा तथा श्रेष्ठ गुणों से प्रसिद्ध जन हैं, उन्हें हर्षित करता है, ऐसे बहुत सुन्दर रूपों से युक्त रक्षाओं से युक्त हो उनकी कामनाओं को पूरा करता है ॥३॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

स्तुति-रक्षण - विकास

Word-Meaning: - [१] हे (ऊर्जा न पात्) = शक्ति को न गिरने देनेवाले, (जातवेदः) = सर्वज्ञ प्रभो ! (सुशस्तिभिः) = उत्तम शंसनों व स्तुतियों के द्वारा तथा (धीतिभिः) = ध्यानों के द्वारा (हितः) = हृदयदेश में स्थापित हुए हुए आप (मन्दस्व) = हमारे जीवनों को आनन्दमय करिये । स्तवन व ध्यान के द्वारा प्रभु का प्रकाश हृदयों में व्यक्त होता है। इस प्रकार व्यक्त हुए हुए प्रभु हमारे जीवन को उल्लास व आनन्द से युक्त करते हैं। उस समय मनुष्य विलास के मार्ग से दूर हुआ हुआ अपनी शक्तियों का रक्षण कर पाता है और अपने ज्ञान को दीप्त करनेवाला होता है। वस्तुतः शरीर शक्ति सम्पन्न होता है और मस्तिष्क ज्ञानोज्ज्वल होता है तो जीवन आनन्दमय होता है। [२] ये उपासक (त्वे) = आप में (इषः) = प्रेरणाओं को (संदधुः) = धारण करते हैं । उपासना के द्वारा आप में स्थित हुए-हुए ये व्यक्ति प्रेरणाओं को प्राप्त करते हैं। इन प्रेरणाओं के अनुसार चलते हुए ये (भूरिवर्पस:) = [ वर्पस् - praise] खूब स्तुतिवाले, चित्र (ऊतयः) = अद्भुत रक्षणोंवाले तथा (वामजाता:) = सुन्दर विकासवाले होते हैं [वामं जातं येषां ] । प्रभु स्तवन ही इन्हें वासनाओं से बचाता है और इनके अन्दर उत्तम दिव्य गुणों का विकास करता है ।
Connotation: - भावार्थ-स्तुति व ध्यान के द्वारा हम प्रभु को देखने का प्रयत्न करें। प्रभु हमें शक्ति देंगे, ज्ञान देंगे। प्रभु स्तवन से हमारी वृत्ति उत्तम बनेगी और हमारे में दिव्य गुणों का विकास होगा।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (ऊर्जः-नपात्-जातवेदः) हे बलस्य न पातयितः जातान् वेदितुमर्ह ! परमात्मन् ! (सुशस्तिभिः-धीतिभिः) सुस्तुतिभिः सत्कर्मभिः सदाचरणैः (हितः-मन्दस्व) धृतोऽस्मान् हर्षय (भूरिवर्पसः-चित्रोतयः) भूरीणि वर्पांसि रूपाणि येषां ते तथा चित्रा अद्भुता रक्षा येषां ते (वामजाताः) वननीयैर्गुणैः प्रसिद्धा जनाः (त्वे-इषः-सं दधुः) त्वयि परमात्मनि स्वकीया एषणाः कामाः सन्दधति समर्पयन्ति त्वं तान् प्रसादयेति शेषः ॥३॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O divine light and fire of life, child as well as protector and sustainer of energy pervasive in the entire world of existence, rise and rejoice as well as exhilarate us, with hymns and noble thoughts and actions as you are invoked and kindled in the vedi and in the heart and soul. Faithful celebrants bring you food in homage, and in you they vest their desires and aspirations of various forms and wondrous efficacy arisen from love of the heart and soul.