Word-Meaning: - [१] (यमाय) = सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का नियमन करनेवाले, (राज्ञे) = संसार को व्यवस्थित [regulated] करनेवाले उस प्रभु की प्राप्ति के लिये (मधुमत्तमं हव्यम्) = अत्यन्त माधुर्य से युक्त हव्य को (जुहोतन) = अपने में आहुत करो। अर्थात् हम मधुरतम वाणी का ही प्रयोग करें, और सदा त्यागपूर्वक उपभोग करें, यज्ञशेष का ही सेवन करनेवाले बनें। [२] इस प्रभु की प्राप्ति के लिये ही हम उन (ऋषिभ्यः) = प्रभु का साक्षात्कार करनेवाले ज्ञानियों के लिये (इदं नमः) = इस नमस्कार को करते हैं जो ज्ञानी (पूर्वजेभ्यः) = हमारे पूर्वज हैं, आयुष्य में भी हमारे से बड़े हैं, (पूर्वेभ्यः) = अपना पूरण करनेवाले हैं, और (पथिकृद्भ्यः) = हमारे लिये मार्ग को बनानेवाले हैं। इन ऋषियों का अनुसरण करते हुए हम पथभ्रष्ट नहीं होते ।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि हम [क] अत्यन्त मधुर बनें, [ख] हव्य का ही सेवन करें, [ग] मार्गदर्शक ज्ञानियों का सत्कार करें।