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य॒माय॑ घृ॒तव॑द्ध॒विर्जु॒होत॒ प्र च॑ तिष्ठत । स नो॑ दे॒वेष्वा य॑मद्दी॒र्घमायु॒: प्र जी॒वसे॑ ॥

English Transliteration

yamāya ghṛtavad dhavir juhota pra ca tiṣṭhata | sa no deveṣv ā yamad dīrgham āyuḥ pra jīvase ||

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Pad Path

य॒माय॑ । घृ॒तऽव॑त् । ह॒विः । जु॒होत॑ । प्र । च॒ । ति॒ष्ठ॒त॒ । सः । नः॒ । दे॒वेषु॑ । आ । य॒म॒त् । दी॒र्घम् । आयुः॑ । प्र । जी॒वसे॑ ॥ १०.१४.१४

Rigveda » Mandal:10» Sukta:14» Mantra:14 | Ashtak:7» Adhyay:6» Varga:16» Mantra:4 | Mandal:10» Anuvak:1» Mantra:14


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यमाय घृतवत्-हविः-जुहोत प्रतिष्ठत च) पूर्वोक्त जीवनकाल और विश्वकाल को अनुकूल बनाने के लिए घृतसहित ओषधिरसरूप हवि आदि का होम करो और जीवन की उच्चता को प्राप्त होओ (सः नः जीवसे देवेषु दीर्घम्-आयुः प्रायमत्) एवं वह काल हमारे अधिक और उत्तम जीवन के लिये हमारी इन्द्रियों में दीर्घजीवन का विस्तार करे ॥१४॥
Connotation: - हव्य वस्तुओं में घृत मिलाकर या घृत के साथ हवन करने से इन्द्रिय-शक्तियाँ चिरस्थायी रहती हैं ॥१४॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

घृतवत् हवि

Word-Meaning: - [१] (यमाय) = उस सर्वनियन्ता प्रभु की प्राप्ति के लिये (घृतवत्) = 'मलों के क्षरण व ज्ञान की दीप्ति' वाली (हविः जुहोत) = हवि के देनेवाले बनो। अर्थात् प्रभु प्राप्ति के लिये मन में से राग-द्वेष आदि मलों को दूर करो, मस्तिष्क को, स्वाध्याय द्वारा ज्ञान से दीप्त करो तथा सदा यज्ञशेष का सेवन करनेवाले बनो । [२] इस प्रकार मन की निर्मलता, मस्तिष्क की दीप्ति, तथा यज्ञशेष के सेवन रूप त्याग से प्रभु की प्राप्ति तो होती है । (च) = साथ ही, इस संसार में (प्रतिष्ठत) = प्रतिष्ठा को भी पावो। ये कर्म, विशेषतः दान हमारी प्रतिष्ठा का भी कारण बनता है। [३] (स) = वे प्रभु (नः) = हमें (देवेषु) = देवताओं में होनेवाले (दीर्घम् आयुः) = दीर्घ जीवन को (आयमत्) = दें जिससे (प्रजीवसे) = हम जीवन की प्रकृष्ट व उत्तम बना पायें। साधना के लिये भी दीर्घ जीवन सहायक होता है। 'दीर्घ जीवन' देवताओं को प्राप्त होता है। वह दीर्घ जीवन हमें भी प्राप्त हो, और उस जीवन में हम देव बनने का प्रयत्न करें।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि - [क] हम निर्दोष हों, [ख] दीप्त - ज्ञान वाले हों, [ग] त्याग की वृत्ति वाले हों। इस साधना के लिये हमें दीर्घ जीवन प्राप्त हो ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यमाय घृतवत्-हविः-जुहोत प्रतिष्ठत च) यमाय पूर्वोक्ताय जीवनकालाय विश्वकालाय वा तत्सौष्ठ्यसम्पादनायेत्यर्थः। घृतयुक्तं हवनं जुहोत कुरुत प्रतिष्ठत च तत्र प्रकृष्टतां च प्राप्नुत (सः-नः-जीवसे देवेषु दीर्घम् आयुः प्रायमत्) सोऽस्माकं जीवनाय देवेष्विन्द्रियेषु दीर्घस्थायित्वं विस्तारयति ॥१४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Offer holy homage full of ghrta to Yama for harmony between your life and the cosmic order of time and nature, and abide in that mood and state of karma. And may the lord vest strength and efficiency in our body, senses and mind for a long life of good health.