Word-Meaning: - [१] (यमाय) = उस सर्वनियन्ता प्रभु की प्राप्ति के लिये (घृतवत्) = 'मलों के क्षरण व ज्ञान की दीप्ति' वाली (हविः जुहोत) = हवि के देनेवाले बनो। अर्थात् प्रभु प्राप्ति के लिये मन में से राग-द्वेष आदि मलों को दूर करो, मस्तिष्क को, स्वाध्याय द्वारा ज्ञान से दीप्त करो तथा सदा यज्ञशेष का सेवन करनेवाले बनो । [२] इस प्रकार मन की निर्मलता, मस्तिष्क की दीप्ति, तथा यज्ञशेष के सेवन रूप त्याग से प्रभु की प्राप्ति तो होती है । (च) = साथ ही, इस संसार में (प्रतिष्ठत) = प्रतिष्ठा को भी पावो। ये कर्म, विशेषतः दान हमारी प्रतिष्ठा का भी कारण बनता है। [३] (स) = वे प्रभु (नः) = हमें (देवेषु) = देवताओं में होनेवाले (दीर्घम् आयुः) = दीर्घ जीवन को (आयमत्) = दें जिससे (प्रजीवसे) = हम जीवन की प्रकृष्ट व उत्तम बना पायें। साधना के लिये भी दीर्घ जीवन सहायक होता है। 'दीर्घ जीवन' देवताओं को प्राप्त होता है। वह दीर्घ जीवन हमें भी प्राप्त हो, और उस जीवन में हम देव बनने का प्रयत्न करें।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि - [क] हम निर्दोष हों, [ख] दीप्त - ज्ञान वाले हों, [ग] त्याग की वृत्ति वाले हों। इस साधना के लिये हमें दीर्घ जीवन प्राप्त हो ।