Word-Meaning: - [१] (यमाय) = उस सर्वनियन्ता प्रभु की प्राप्ति के लिये (सोमं सुनुत) = सोम का अपने में उत्पादन करो। प्रभु 'यम' हैं, मनुष्य भी 'यम'-संयमी बनकर ही उस प्रभु का सच्चा उपासक बन पाता है। यह संयमी पुरुष सोम का सम्पादन करनेवाला होता है । [२] (यमाय) = उस प्रभु की प्राप्ति के लिये (हविः जुहुता) = हवि के देनेवाले बनो । 'कस्मै देवाय हविषा विधेम ' -उस सुखस्वरूप देव का हवि के द्वारा ही तो हम पूजन करते हैं, यज्ञशेष का सेवन ही हवि का स्वीकार करना है। हम सदा पाँचों यज्ञों को करके यज्ञशेष को ग्रहण करें। [३] (यमम्) = उस सर्वनियन्ता प्रभु को (ह) = निश्चय से (यज्ञः) = ' देवपूजा-संगतिकरण व दान' इन धर्मों का पालन करनेवाला ही (गच्छति) = प्राप्त होता है । वह उस यम को प्राप्त होता है जो कि (अग्निदूतः) = उस अग्नि नामक प्रभु का दूत बनता है, संदेशवाहक बनता है। प्रभु से दिये गये ज्ञान को जो सर्वत्र प्रचारित करनेवाला होता है। और (अरंकृत:) = अपने जीवन को सद्गुणों से अलंकृत करता है, अपने जीवन को सद्गुणों से अलंकृत किये बिना वह औरों में ज्ञान का प्रचार कर भी तो नहीं सकता।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि - [क] हम सोम का सम्पादन करें, [ख] ज्ञान का प्रसार करनेवाले बनें, [ग] अपने जीवन को सद्गुणों से मण्डित करें।