वैद्य का अन्तिम कथन [ हस्तस्पर्श व प्रेरणा ]
Word-Meaning: - [१] वैद्य रोगी से अन्त में कहता है कि यह जिह्वा वाणी [वाचः] - उत्साह के शब्दों के द्वारा (पुरोगवी) = आगे ले चलनेवाली होती है। अर्थात् मेरे शब्द तेरे में उत्साह का संचार करें। तुझे इन शब्दों से शीघ्र नीरोग हो जाने का पूर्ण विश्वास हो । [२] और इन (दशशाखाभ्याम्) = दस अंगुली रूप शाखाओंवाले (हस्ताभ्याम्) = हाथों जो कि (अनामयित्नुभ्याम्) = नीरोग करनेवाले हैं, (ताभ्याम्) = उन हाथों से (त्वा) = तुझे (त्वा) = निश्चय से तुझे (उपस्पृशामसि) = हम समीपता से छूते हैं और तेरे इस रोग को दूर करते हैं। इस प्रकार वैद्य उत्साह की वाणी व विशिष्ट स्पर्श से रोगी के रोग को दूर करने का वातावरण उपस्थित करता है ।
Connotation: - भावार्थ - वैद्य रोगी में उत्साह का संचार करता हुआ अपने हस्त- स्पर्श से उसके रोग के दूर भगाने का निश्चय करता है । वायु आदि देवों की अनुकूलता, जल का ठीक प्रयोग, प्राणायाम व योग्य वैद्य की प्रेरणा ये सब बातें हमें नीरोग बनाती हैं और पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करती हैं। स्वस्थ बनकर हम क्रियाशील होते हैं। अस्वस्थ होने पर पड़े रहने की तबीयत होती है । यह स्वस्थ पुरुष 'अंग: ' [अगि गतौ] गतिशील होता है और 'औरवः' [उरोः अपत्यम्:] = खूब विशाल हृदयवाला होता है । स्वास्थ्य के साथ उदारता का सम्बन्ध है, अस्वास्थ्य के साथ संकुचित हृदयता का । इन 'अङ्ग औरवों' का चित्रण करते हुए कहते हैं कि-