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वात॒स्याश्वो॑ वा॒योः सखाथो॑ दे॒वेषि॑तो॒ मुनि॑: । उ॒भौ स॑मु॒द्रावा क्षे॑ति॒ यश्च॒ पूर्व॑ उ॒ताप॑रः ॥

English Transliteration

vātasyāśvo vāyoḥ sakhātho deveṣito muniḥ | ubhau samudrāv ā kṣeti yaś ca pūrva utāparaḥ ||

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Pad Path

वात॑स्य । अश्वः॑ । वा॒योः । सखा॑ । अथो॒ इति॑ । दे॒वऽइ॑षितः । मुनिः॑ । उ॒भौ । स॒मु॒द्रौ । आ । क्षे॒ति॒ । यः । च॒ । पूर्वः॑ । उ॒त । अप॑रः ॥ १०.१३६.५

Rigveda » Mandal:10» Sukta:136» Mantra:5 | Ashtak:8» Adhyay:7» Varga:24» Mantra:5 | Mandal:10» Anuvak:11» Mantra:5


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (वातस्य-अश्वः) वातसूत्र से गति करता हुआ (वायोः-सखा) विद्युत् के समान धर्मवाला प्रतापवान् (अथ-उ) और (देवेषितः-मुनिः) परमात्मदेव से प्रेरित मननीय सूर्य (उभौ समुद्रौ-आ क्षेति) दोनों अन्तरिक्षरूप आकाशों में भलीभाँति निवास करता है (यः पूर्वः-उत-अपरः-च) जो पूर्व दिशावाला और जो पश्चिम दिशावाला है ॥५॥
Connotation: - सूर्य आकाश में वातसूत्र द्वारा गति करता है, विद्युत् के समान प्रतापवान् परमात्मा से प्रेरित हुआ पूर्व पश्चिम में वर्तमान होता है, उसे जानना उससे लाभ उठाना चाहिये ॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

वायु-भक्षण

Word-Meaning: - [१] यह साधक (वातस्य) = वायु का, प्राणों का (अश्वः) = [अश भोजने] खानेवाला होता है । 'अभक्षः, वायुभक्ष:' इस वाक्य में पतञ्जलि ने 'वातस्याश्वः' का भाव व्यक्त कर ही दिया है। 'प्रातःकाल हवा खाने जाना' यह वाक्य बोलचाल में प्रयुक्त होता ही है । प्राणायाम का अभ्यास ही 'वातस्य अश्वः' बनना है । इस अभ्यास से यह (वायोः सखा) = उस गति के द्वारा सब बुराइयों के गन्ध [हिंसन] को करनेवाले प्रभु का मित्र होता है। प्राणसाधना इसके हृदय को निर्मल करती है, उस निर्मल हृदय में यह प्रभु का दर्शन करता है । [२] (अध) = अब, इस प्रभु-दर्शन के होने पर यह (देवेषितः) = उस देव से प्रेरित होता है, प्रभु की प्रेरणा को सुनता है । (मुनि:) = विचारशील बनता है । इस प्रभु की प्रेरणा को सुनकर और विचारशील बनकर यह (उभौ समुद्रौ) = दोनों समुद्रों में (आक्षेति) = निवास करता है (यः च पूर्व:) = जो पहला समुद्र है (उत) = और (अपरः) = जो पिछला समुद्र है । स सद्य एति पूर्वस्यादुतरं समुद्रम्' इस मन्त्र भाग के अनुसार यहां दो समुद्रों का अभिप्राय 'ब्रह्मचर्य और गृहस्थ' से है । ब्रह्मचर्याश्रम के बाद यह गृहस्थ में प्रवेश करता है। गृहस्थ में भी संयम से चलता हुआ यह ब्रह्मचारी ही होता है। इस प्रकार यह गृहस्थ को ब्रह्मचर्य से मिला देता है । यहाँ दोनों समुद्रों का भाव 'ज्ञान-विज्ञान' भी लिया जा सकता है ।
Connotation: - भावार्थ - प्राणसाधना के द्वारा हम प्रभु के मित्र बनें। प्रभु प्रेरणा को सुनते हुए जीवन को ठीक प्रकार से बिताएँ ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (वातस्य-अश्वः) वातसूत्रेण गतिं कुर्वाणः (वायोः सखा) विद्युतः समानख्यानः “य इन्द्रः स वायुः” [श० ४।१।३।९] “यदशनिरिन्द्रः” [कौ० ६।९] “विद्युद्वा अशनिः” [श० ६।१।३।१४] (अथ-उ) अथ च (देवेषितः-मुनिः) परमात्मदेवेन प्रेरितो मननीयः सूर्यः (उभौ समुद्रौ-आ क्षेति) द्वौ खल्वन्तरिक्षरूपावाकाशौ समन्तान्निवसति (यः पूर्वः-उत-अपरः-च) यः पूर्वदिग्वर्ती यश्च पश्चिमदिग्वर्ती ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - The sun moves in orbit by the dynamics of cosmic energy. It is a cooperative friend of cosmic energy, inspired and energised by the supreme Divinity. An object of realisation in meditation, it illuminates both sides of its cosmic movement in space, the former and the latter both in the cosmic orbit.$(The soul in meditation can illuminate both sides of its orbit in time and space, the past and the future both as revealed by the sage Patanjali in accordance with the Veda.)