मूल कर्त्तव्यों का पालन व मोक्ष (निरयण)
Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र में 'अनुदेयी कैसे होगी' यह प्रश्न था । इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि (यथा) = जिस प्रकार (अनुदेयी) = इस रथ का [ restoration] पुनः प्रत्यर्पण (अभवत्) = होता है (ततः) = उसके दृष्टिकोण से यह वेदज्ञान (अग्रं अजायत) = सृष्टि के प्रारम्भ में ही आविर्भूत होगा । प्रभु ने वेदज्ञान पहले ही दे दिया । [२] इस वेदज्ञान का सार यह है कि (पुरस्तात्) = पहले (बुध्नः) = मूल (आततः) = विस्तृत होता है, अर्थात् जीव अपने मौलिक कर्त्तव्यों का [fist and foremost duties] पालन करता है, (पश्चात्) = इन कर्त्तव्यों का पालन करने के बाद (निरयणम्) = संसार से ऊपर उठकर [निः] प्रभु की प्राप्ति [अयनं] होती है। मनुष्य शरीर को स्वस्थ रखे, मन को निर्मल व बुद्धि को दीप्त करे। ये ही उसके मूल कर्त्तव्य हैं। इनका पालन करने पर पुनः शरीर लेने की आवश्यकता नहीं रहती। यही 'निरयण' है।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु ने वेद में जो हमारे मौलिक कर्त्तव्य प्रतिपादित किये हैं, उनका पालन हमारे मोक्ष का कारण होता है।