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कः कु॑मा॒रम॑जनय॒द्रथं॒ को निर॑वर्तयत् । कः स्वि॒त्तद॒द्य नो॑ ब्रूयादनु॒देयी॒ यथाभ॑वत् ॥

English Transliteration

kaḥ kumāram ajanayad rathaṁ ko nir avartayat | kaḥ svit tad adya no brūyād anudeyī yathābhavat ||

Mantra Audio
Pad Path

कः । कु॒मा॒रम् । अ॒ज॒न॒य॒त् । रथ॑म् । कः । निः । अ॒व॒र्त॒य॒त् । कः । स्वि॒त् । तत् । अ॒द्य । नः॒ । ब्रू॒या॒त् । अ॒नु॒ऽदेयी॑ । यथा॑ । अभ॑वत् ॥ १०.१३५.५

Rigveda » Mandal:10» Sukta:135» Mantra:5 | Ashtak:8» Adhyay:7» Varga:23» Mantra:5 | Mandal:10» Anuvak:11» Mantra:5


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (कुमारं कः-अजनयत्) न मरनेवाले अमर आत्मा को कौन उत्पन्न करता है ? कोई नहीं (रथं कः-निः अवर्तयत्) शरीररथ को कौन मनुष्य घड़ता है ? कोई नहीं (कः स्वित्-अद्य नः-ब्रूयात्) कौन ही इस समय हमें बता सके (यथा-अनुदेयी-अभवत्) जैसे अनुग्रहवाला कृपालु है ॥५॥
Connotation: - अमर आत्मा को कोई उत्पन्न नहीं करता, आत्मा तो नित्य है, इसके शरीररथ को कौन मनुष्य घड़ता है ? कोई मनुष्य नहीं। कौन कह सके ? पर हाँ अनुग्रहकर्ता परमात्मा इसे शरीर में भेजता है, वह इस शरीर को रचता है ॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

कुमार का रथ से मोक्षण

Word-Meaning: - [१] (कः) = वे अनिर्वचनीय, आनन्दमय प्रभु ही (कुमारम्) = वासनाओं को पूर्णरूप से नष्ट करनेवाले पुरुष को (अजनयत्) = उत्पन्न करते हैं । प्रभु कृपा से ही हम कुमार बन पाते हैं। (कः) = वे आनन्दमय प्रभु ही (रथम्) = इस शरीर रथ को (निरवर्तयत्) = बनाते हैं । रथ का निर्माण करनेवाले प्रभु ही हैं। [२] (कः) = वे आनन्दमय प्रभु ही (स्वित्) = निश्चय से (नः) = हमारे लिए (अद्य) = आज (तत्) = उस उपाय को (ब्रूयात्) = बतलाते हैं, (यथा) = जिससे कि (अनुदेयी) = इस रथ का पुनः वापिस करना [restoration] (आवत्) = हुआ करता है । अर्थात् प्रभु हमें उस उत्कृष्ट ज्ञान को देते हैं, जिसके अनुसार चलने पर हमें इस शरीर रथ की पुनः आवश्यकता नहीं रह जाती। इससे हमारा मोक्ष हो जाता है ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु हमें 'कुमार' बनाते हैं। हमें शरीर - रथ देते हैं। इस शरीर रथ के पुनः वापिस करने का उपाय भी बतलाते हैं ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (कुमारं कः-अजनयत्) कुत्सितमारं जीवात्मानं को जनयति ? न कोऽपीत्यर्थः (रथं कः-निः अवर्तयत्) शरीररथं को जनो निर्माति ? न कोऽपि (कः स्वित्-अद्य नः-ब्रूयात्) को ह्यस्मान् सम्प्रति कथयेत् (यथा-अनुदेयी-अभवत्) यथा ह्यनुग्रहवान् भवेत् ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Dear soul, who creates this chariot for the spirit? Who completes and who dismantles it? Who at all would speak of this to us now so that we could have a vision of the future and knowledge of restitution? The Lord alone can say.