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यं कु॑मार॒ प्राव॑र्तयो॒ रथं॒ विप्रे॑भ्य॒स्परि॑ । तं सामानु॒ प्राव॑र्तत॒ समि॒तो ना॒व्याहि॑तम् ॥

English Transliteration

yaṁ kumāra prāvartayo rathaṁ viprebhyas pari | taṁ sāmānu prāvartata sam ito nāvy āhitam ||

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Pad Path

यम् । कु॒मा॒र॒ । प्र । अव॑र्तयः । रथ॑म् । विप्रे॑भ्यः । परि॑ । तम् । साम॑ । अनु॑ । प्र । अ॒व॒र्त॒त॒ । सम् । इ॒तः । ना॒वि । आऽहि॑तम् ॥ १०.१३५.४

Rigveda » Mandal:10» Sukta:135» Mantra:4 | Ashtak:8» Adhyay:7» Varga:23» Mantra:4 | Mandal:10» Anuvak:11» Mantra:4


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (कुमार) हे न मरणशील जीवात्मन् ! (यं-रथम्) जिस शरीर को (विप्रेभ्यः परि प्र अवर्तयः) विद्वानों-मेधावी लोगों से ज्ञान प्राप्त करके चलाता है (तं साम-अनु) उस देहरथ को शिक्षित जन-अध्यात्म सुख जिससे हो (नावि-समाहितम्) नौका में रखे रथ की भाँति शरीररथ को चलाता है ॥४॥
Connotation: - जीवात्मा विद्वानों से ज्ञान प्राप्त करके अध्यात्मिक सुख मिले, इस ढंग से नौका में रखे रथ के समान नदी पार करने को जैसे होता है, ऐसे संसारसागर को पार करने के लिए देह को अध्यात्ममार्ग में चलाता है ॥४॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

नाव में आहित रथ

Word-Meaning: - [१] हे (कुमार) = क्रीड़क की मनोवृत्ति से चलनेवाले पुरुष ! (यं रथम्) = जिस शरीर - रथ को (विप्रेभ्यः समित) = विशेषरूप से तेरा पूरण करनेवाले [वि-प्रा] माता, पिता व आचार्य आदि से संगत हुए हुए तूने (परि) = चारों ओर (प्रावर्तयः) = तूने गतिमय किया है। माता-पिता व आचार्य के सम्पर्क में आनेवाला व्यक्ति ही अपनी कमियों को दूर करके शरीर रथ को अच्छी प्रकार मार्ग पर ले चलता है । [२] (तम्) = उस (नावि आहितम्) = प्रभु रूप नाव में स्थापित किये हुए रथ को साम (अनु प्रावर्तत) = शान्ति अनुकूलता से प्राप्त होती है। यह रथ प्रभु रूप नाव में आहित होने के कारण इस भवसागर में डूब नहीं जाता। प्रभु नाव बनती है जो इसे विषय जल में डूबने नहीं देती । भाव यह है कि हमारे रथ के संचालक प्रभु हों। इसकी बागडोर प्रभु के हाथ में हो ।
Connotation: - भावार्थ - इस शरीर - रथ के संचालन की शिक्षा माता, पिता व आचार्य से प्राप्त होती है। भवसागर से पार करने के लिए इसे प्रभु रूप नाव का सहारा होता है। इस सहारे से ही जीवन की गाड़ी शान्ति से चलती है ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (कुमार) हे अमरणशील जीवात्मन् ! (यं रथम्) यं शरीररथं त्वं (विप्रेभ्यः पर प्र अवर्तयः) मेधाविभ्यो ज्ञानं प्राप्य प्रवर्तयसि (तं साम-अनु नावि समाहितं प्र अवर्तत) तं देहरथं शिक्षितौ जनः साम-अध्यात्मसुखं यथा स्यात् नौकायां धृतं शरीररथं तथा प्रवर्तयति ‘अन्तर्गतणिजर्थः’ ॥४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O soul, that body which you move like a chariot away from the sages, the wise man settled at peace in the heart moves the same chariot all secure as if it is safely placed in a boat to cross the seas.