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पु॒रा॒णाँ अ॑नु॒वेन॑न्तं॒ चर॑न्तं पा॒पया॑मु॒या । अ॒सू॒यन्न॒भ्य॑चाकशं॒ तस्मा॑ अस्पृहयं॒ पुन॑: ॥

English Transliteration

purāṇām̐ anuvenantaṁ carantam pāpayāmuyā | asūyann abhy acākaśaṁ tasmā aspṛhayam punaḥ ||

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Pad Path

पु॒रा॒णा॑न् । अ॒नु॒ऽवेन॑न्तम् । चर॑न्तम् । पा॒पया॑ । अ॒मु॒या । अ॒सू॒यन् । अ॒भि । अ॒चा॒क॒श॒म् । तस्मै॑ । अ॒स्पृ॒ह॒य॒म् । पुन॒रिति॑ ॥ १०.१३५.२

Rigveda » Mandal:10» Sukta:135» Mantra:2 | Ashtak:8» Adhyay:7» Varga:23» Mantra:2 | Mandal:10» Anuvak:11» Mantra:2


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (पुराणान्) पुरातन व्यवहारों को (अनुवेनन्तम्) उनके अनुसार फलप्रदान की कामनावाले को (अमुया पायया) उस पापवृत्ति-वासना से (चरन्तम्) सेवन करता हुआ (असूयन्) निन्दित करता हुआ (अभि अचाकशम्) मै देखता हूँ (तस्मै) उसके लिए (पुनः) फिर (अस्पृहयम्) इच्छा करता हूँ-चाहता हूँ ॥२॥
Connotation: - मानव पूर्व कर्मों के अनुसार पापकर्मों का दुष्फल भोगता है और पश्चात्ताप करता है, निन्दा करता है, फिर भी पापवासना-दूषित वासना के कारण फिर दूषित कर्म करने लगता है, यह साधारणजन की स्थिति है ॥२॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

विषय - दोष-दर्शन

Word-Meaning: - [१] 'पुराण' शब्द का अर्थ गत मन्त्र में हो चुका है। (पुराणान्) = इन बड़ी उमर में भी अजीर्णशीर्ण शरीरवालों को (अनुवेनन्तम्) = चाहते हुए उस प्रभु को (अभ्यचाकशम्) = मैंने देखा है । परन्तु कब ? अमुया पापया उस पापवृत्ति ले चरन्तम्-चलते हुए को अथवा विषयों को चरते हुए को असूयन्- दोषदृष्टि से देखते हुए मैंने प्रभु को देखा है । जब मैं विषयों के चरने को दोष समझने लगा तब मैंने उस प्रभु को देखा। संसार में दो ही मार्ग हैं, एक प्रकृति की ओर जाने का, दूसरा प्रभु की ओर लौटने का सामान्यतः मनुष्य प्रथम मार्ग से ही जाता है। उस मार्ग के दोषों को देखने पर, उससे विरक्त होकर यह प्रभु की ओर लौटता है । [२] विषयों के दोषों को देखने पर तस्मा उस प्रभु के लिए पुनः अस्पृहयम् - मैंने कामना की है। इस कामना के होने पर ही हमारा जीवन का मार्ग परिष्कृत होता है और विषयासक्त न होकर प्रभु की ओर बढ़ते चलते हैं ।
Connotation: - भावार्थ - विषय - दोष-दर्शन हमें प्रभु की ओर चलने की प्रेरणा देता है ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (पुराणान्-अनुवेनन्तम्) पुरातनान् व्यवहाराननुलक्ष्य फलप्रदानं कामयमानं (अमुया पापया) तया पापया पापवृत्त्या वासनया (चरन्तम् असूयन्-अभि अचाकशम्) चरन् “प्रथमार्थे द्वितीया व्यत्ययेन” अहं निन्दयन् पश्यामि (तस्मै पुनः-अस्पृहयम्) तस्मै-पुनः स्पृहयामि-वाञ्छामि ॥२॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - I see the father loving and watching the eternal human souls. I see the human soul discontented, displeased, protesting and still living with that same sinful conduct. I see all this and yet I wish I would love to live the same again.