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तस्य॑ व॒यं सु॑म॒तौ य॒ज्ञिय॒स्यापि॑ भ॒द्रे सौ॑मन॒से स्या॑म । स सु॒त्रामा॒ स्ववाँ॒ इन्द्रो॑ अ॒स्मे आ॒राच्चि॒द्द्वेष॑: सनु॒तर्यु॑योतु ॥

English Transliteration

tasya vayaṁ sumatau yajñiyasyāpi bhadre saumanase syāma | sa sutrāmā svavām̐ indro asme ārāc cid dveṣaḥ sanutar yuyotu ||

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Pad Path

तस्य॑ । व॒यम् । सु॒ऽम॒तौ । य॒ज्ञिय॑स्य । अपि॑ । भ॒द्रे । सौ॒म॒न॒से । स्या॒म॒ । सः । सु॒त्रामा॑ । स्वऽवा॑न् । इन्द्रः॑ । अ॒स्मे इति॑ । आ॒रात् । चि॒त् । द्वेषः॑ । स॒नु॒त । यु॒यो॒तु॒ ॥ १०.१३१.७

Rigveda » Mandal:10» Sukta:131» Mantra:7 | Ashtak:8» Adhyay:7» Varga:19» Mantra:7 | Mandal:10» Anuvak:11» Mantra:7


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (तस्य) उस (यज्ञियस्य) सङ्गमनीय-परमात्मा की या राजा की (सुमतौ) कल्याणी मति में (सौमनसे) अच्छे मनोभाव में (भद्रे) कल्याणरूप में (स्याम) होवें (सः) वह (सुत्रामा) सुरक्षक (स्ववान्) सामर्थ्यवाला (इन्द्रः) परमात्मा या राजा (आरात्-चित्) दूर से भी (द्वेषः) द्वेष करनेवाले शत्रु को (सनुतः) सदा (युयोतु) पृथक् करे ॥७॥
Connotation: - उपासकजनों को चाहिये कि वह परमात्मा की कल्याणकारी वेदवाणी के अनुसार आचरण करते हुए जीवन व्यतीत करें, तो दुःखदायी शत्रु भी उनसे दूर हो जाते हैं एवं प्रजाजन राजा की न्यायव्यवस्था या शासनव्यवस्था में रहने से शत्रुओं से सुरक्षित रहते हैं ॥७॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सुमति-सौमनस

Word-Meaning: - [१] प्रभु यज्ञिय हैं, पूज्य हैं, संगतिकरण योग्य हैं तथा समर्पणीय हैं । (तस्य यज्ञियस्य) = उस यज्ञिय प्रभु की (सुमतौ) = कल्याणी मति में वयं स्याम हम हों। अपि और (भद्रे सौमनसे) = [स्याम] उस उत्तम मन में हम स्थित हों जो कि सबका भद्र व कल्याण ही सोचता है । [२] (सः) = वह (सुत्रामा) = उत्तम त्राण करनेवाला (स्ववान्) = आत्मिक शक्ति को देनेवाला (इन्द्रः) = शत्रु - विद्रावक प्रभु (अस्मे) = हमारे से (द्वेषः) द्वेष को (आरात् चित्) = निश्चय से बहुत दूर (सनुतः) = अन्तर्हित करके (युयोतु) = पृथक् कर दे 'द्वेष हमें फिर देख भी न सके' इस रूप में प्रभु द्वेष को हमारे से दूर कर दे ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु कृपा से हमें सुमति व सौमनस प्राप्त हो । द्वेष हमारे से दूर हो। यह सूक्त शत्रु - विजय से प्रारम्भ होता है, सुमति व सौमनस की प्राप्ति पर समाप्त होता है । साधना यही है कि हम अन्तः शत्रुओं को जीतकर उत्तम बुद्धि व मनवाले बनें। ऐसा बनने पर हम 'शकपूतः'=शक्ति के द्वारा पवित्र जीवनवाले होंगे। तथा नार्मेधः = नृमेध यज्ञ करनेवाले, लोकहित की प्रवृत्तिवाले बनेंगे। यह 'शकपूत नार्मेध' ही अग्रिम सूक्त का ऋषि है। यह इस प्रकार मन्त्र जप करता है-

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (तस्य यज्ञियस्य सुमतौ) तस्य सङ्गमनीयस्य परमात्मनो राज्ञो वा कल्याण्यां मतौ (सौमनसे भद्रे स्याम) सुमनोभावे कल्याणरूपे भवेम (सः-सुत्रामा स्ववान्) स सुरक्षकः सामर्थ्यवान् (इन्द्रः) परमात्मा राजा वा (आरात्-चित्-द्वेषः सनुतः-युयोतु) दूरादपि द्वेष्टॄन् शत्रून् सर्वदा “सनुतः सर्वदा” [अव्ययार्थनिबन्धनं दयानन्दः] पृथक् करोतु ॥७॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - We pray may we ever abide in the good will and loving kindness of adorable Indra. May he, self- refulgent, self-potent, saviour protector, keep off and drive away for all time elements of hate and enmity far and near, all.