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काम॒स्तदग्रे॒ सम॑वर्त॒ताधि॒ मन॑सो॒ रेत॑: प्रथ॒मं यदासी॑त् । स॒तो बन्धु॒मस॑ति॒ निर॑विन्दन्हृ॒दि प्र॒तीष्या॑ क॒वयो॑ मनी॒षा ॥

English Transliteration

kāmas tad agre sam avartatādhi manaso retaḥ prathamaṁ yad āsīt | sato bandhum asati nir avindan hṛdi pratīṣyā kavayo manīṣā ||

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Pad Path

कामः॑ । तत् । अग्रे॑ । सम् । अ॒व॒र्त॒त॒ । अधि॑ । मन॑सः । रेतः॑ । प्र॒थ॒मम् । यत् । आसी॑त् । स॒तः । बन्धु॑म् । अस॑ति । निः । अ॒वि॒न्द॒न् । हृ॒दि । प्र॒तीष्या॑ । क॒वयः॑ । म॒नी॒षा ॥ १०.१२९.४

Rigveda » Mandal:10» Sukta:129» Mantra:4 | Ashtak:8» Adhyay:7» Varga:17» Mantra:4 | Mandal:10» Anuvak:11» Mantra:4


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (अग्रे कामः) आरम्भ सृष्टि में काम अर्थात् अभिलाष-इच्छाभाव (तत्-यत्) वह जो (मनसः-अधि) मन के अन्दर (समवर्तत) वर्त्तमान होता है (प्रथमं रेतः) प्रथम प्राणी का बीज (आसीत्) है (कवयः) क्रान्तदर्शी विद्वान् (असति) अशरीर चेतन आत्मा में (सतः) शरीर के निमित्त (बन्धुम्) बाँधनेवाले उस रेतः-मानवबीजशक्ति को (मनीषा) विवेचनशील बुद्धि से (प्रतीष्य) प्रतीत करके निश्चित करके (हृदि) हृदय में (निः-अविन्दन्) निर्विण्ण हो जाते हैं, वैराग्य को प्राप्त हो जाते हैं ॥४॥
Connotation: - आरम्भ सृष्टि में भोगों के लिए कामभाव वर्त्तमान होता है, जो मानव की बीजशक्तिरूप में प्रकट होता है, क्रान्तदर्शी विद्वान् आत्मा के अन्दर शरीर का बाँधनेवाला है, उसे समझ कर वैराग्य को प्राप्त होते हैं ॥४॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

संकल्प रूप

Word-Meaning: - (अग्रे) = सृष्टि के पूर्व (तत्) = वह (मनसः अधि) = मन से उत्पन्न होनेवाली (कामः) = इच्छा के समान एक कामना ही (सम् अवर्तत) = सर्वत्र विद्यमान थी, (यत् प्रथमम् रेतः आसीत्) = जो सबसे प्रथम इस जगत् का प्रारम्भिक बीजवत् थी । (कवयः) = क्रान्तदर्शी पुरुष (हृदि प्रति इष्य) = हृदय में पुनः-पुनः विचार कर (असति) = अप्रकट तत्त्व में ही (सतः बन्धुम्) = सत् रूप प्रकट तत्त्व को बाँधनेवाला बल (निर् अविन्दन्) = प्राप्त करते हैं ।
Connotation: - भावार्थ- सृष्टि से पूर्व मनोकामना ही थी ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (कामः-तत्-अग्रे) आरम्भसृष्टौ-अग्रे कामोऽभिलाषः (यत्-मनसः-अधि सम् अवर्तत) यत् खलु मनसोऽभ्यन्तरे प्रसिद्धो जातः (प्रथमं रेतः-आसीत्) यत् प्रथमं प्राणिबीजमासीत् “रेतः पुरुषस्य प्रथमं सम्भवतः सम्भवति” [ऐ० ३।२] (कवयः) क्रान्तदर्शिनो विद्वांसः (असति सतः-बन्धुं मनीषा प्रतीष्य) अशरीरिणि खल्वात्मनि तन्निमित्तं शरीरस्य बन्धयितारं विवेचनशीलया बुद्ध्या प्रतीत्य निश्चित्य (हृदि निः-अविन्दन्) हृदये निर्विण्णा अभवन् वैराग्यं प्राप्नुवन् ॥४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - There is love and desire before the creation at the heart of Brahma which is the first, original and ultimate seed of the world of existence that comes into being. Sages blest with vision, by divine inspiration and mind in meditation, realise the world of existence from the tangible upto the intangible state implicit in the seed state of Prakrti subsisting in the divine mind.