'एतावानस्य महिमा' 'अतो ज्यायाँश्च पूरुषः '
Word-Meaning: - [१] (अहं एव) = मैं ही (विश्वा भुवनानि आरभमाणा) = सब भुवनों को बनाती हुई (वातः इव) = वायु की तरह (प्रवामि) = गतिवाली होती हूँ। जिस प्रकार वायु निरन्तर चल रही है, उसी प्रकार प्रभु की क्रिया भी स्वाभाविक है। वे अपनी इस क्रिया से इस ब्रह्माण्ड का निर्माण करते हैं। इस निर्माण कार्य में उन्हें किसी दूसरे की सहायता की अपेक्षा नहीं। [२] वे प्रभु (दिवा परः) = इस द्युलोक से परे भी हैं, और (एना पृथिव्याः परः) = इस पृथ्वी से परे भी हैं। ये द्युलोक व पृथ्वीलोक प्रभु को अपने में समा नहीं लेते। हाँ, (महिना) = अपनी महिमा से वह प्रभु शक्ति (एतावती) = इतनी (संबभूव) = है। अर्थात् प्रभु की महिमा इस ब्रह्माण्ड के अन्दर ही दिखती है। ब्रह्माण्ड से परे तो प्रभु का अचिन्त्य निर्विकार निराकार रूप ही है। इस ब्रह्माण्ड में ही वे साकार दिखते हैं 'रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव' । 'एतावानस्य महिमा', यह संसार ही प्रभु की महिमा है । परन्तु वे प्रभु इस संसार में ही समाप्त नहीं हो जाते 'अतो ज्यायाँश्च पूरुषः'।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु अपनी स्वाभाविकी क्रिया से इस ब्रह्माण्ड का निर्माण करते हैं। यह ब्रह्माण्ड प्रभु की महिमा है। प्रभु इसमें सीमित नहीं हो जाते, वे इससे परे भी हैं। सम्पूर्ण सूक्त प्रभु की महिमा का गायन कर रहा है। यह गायन करनेवाला अपने को प्रभु से खेले जानेवाले इस संसार नाटक का एक पात्र जानता है 'शैलूषि'। इस प्रकार अनासक्ति व प्रभु- स्मरण के कारण यह पाप का [कुल्मल] उखाड़नेवाला [बर्हिषः] 'कुल्मल-बर्हिष' कहलाता है। यह सुन्दर दिव्यगुणोंवाला 'वामदेव' बनता है, पापों व कुटिलताओं को छोड़ने के कारण 'अंहोमुक्' है । यह प्रार्थना करता है कि-