Word-Meaning: - [१] (अहम्) = मैं (सोमम्) = उस सोम को (बिभमि) = धारण करता हूँ, जो (आहनसम्) = शरीर के सब रोगों का हनन करनेवाला है। (अहम्) = मैं (त्वष्टारम्) = निर्माण की देवता को (उत) = और (पूषणं भगम्) = पोषण के लिए आवश्यक ऐश्वर्य को धारण करता हूँ । अर्थात् मैं उपासक को उस सोम शक्ति से [= वीर्य शक्ति से] युक्त करता हूँ, जो उसके शरीर में रोगों को नहीं आने देती । मैं उस उपासक को निर्माण की वृत्तिवाला बनाता हूँ तथा पोषण के लिए पर्याप्त धन प्राप्त कराता हूँ । [२] (अहम्) = मैं (हविष्मते) = हविष्मान् के लिए, सदा दानपूर्वक अदन करनेवाले के लिए (द्रविणं दधामि) = धन का पोषण करता हूँ । उसे लोकहित के कार्यों के लिए धन की कभी कमी नहीं रहती (सुप्राव्ये) = [सु+प्र+अव्] उत्तमता से उत्कृष्ट रक्षण करनेवाले के लिए मैं धन का धारण करता हूँ । (यजमानाय) = यज्ञशील पुरुष के लिए मैं धन का धारण करता हूँ तथा सुन्वते सोमयज्ञों को करनेवाले के लिए मैं धन को देता हूँ । राष्ट्र रक्षा के लिए निर्माणात्मक सब कर्म सब कर्म ' सोमयज्ञ' कहलाते हैं । इन सोम यज्ञों को करनेवालों के लिए प्रभु धन की कमी नहीं होने देते ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु वीर्य शक्ति को प्राप्त करा के उपासक को नीरोग बनाते हैं। निर्माणात्मक कार्यों में उसे प्रवृत्त करके पोषण के लिए पर्याप्त धन देते हैं। दानपूर्वक अदन करनेवाला [हविष्मान्] उत्तम रक्षण में प्रवृत्त [सुप्रावी] यज्ञशील [यजमान] निर्माण के कार्य में लगा हुआ व्यक्ति [सुन्वन्] प्रभु के धन का पात्र होता है।