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अ॒यं वे॒नश्चो॑दय॒त्पृश्नि॑गर्भा॒ ज्योति॑र्जरायू॒ रज॑सो वि॒माने॑ । इ॒मम॒पां सं॑ग॒मे सूर्य॑स्य॒ शिशुं॒ न विप्रा॑ म॒तिभी॑ रिहन्ति ॥

English Transliteration

ayaṁ venaś codayat pṛśnigarbhā jyotirjarāyū rajaso vimāne | imam apāṁ saṁgame sūryasya śiśuṁ na viprā matibhī rihanti ||

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Pad Path

अ॒यम् । वे॒नः । चो॒द॒य॒त् । पृश्नि॑ऽगर्भाः । ज्योतिः॑ऽजरायुः । रज॑सः । वि॒ऽमाने॑ । इ॒मम् । अ॒पाम् । स॒म्ऽग॒मे । सूर्य॑स्य । शिशु॑म् । न । विप्राः॑ । म॒तिऽभिः॑ । रि॒ह॒न्ति॒ ॥ १०.१२३.१

Rigveda » Mandal:10» Sukta:123» Mantra:1 | Ashtak:8» Adhyay:7» Varga:7» Mantra:1 | Mandal:10» Anuvak:10» Mantra:1


BRAHMAMUNI

इस सूक्त में परमात्मा ब्रह्माण्ड का रक्षक, लोगों का चालक, वेद का रचयिता, वेद शाश्वत है, परमात्मा जीवात्मा के हृदयघर में मित्र की भाँति प्रवेश करता है इत्यादि विषय हैं।

Word-Meaning: - (अयं वेनः) यह कमनीय परमात्मा या विद्युत् देव (ज्योतिर्जरायुः) ज्योति इसकी जरायु है, ऐसे गर्भरूप सब जगत् को रखता है परमात्मा या मेघ को रखता है, विद्युद्देव (रजसः-विमाने) लोकसमूह ब्रह्माण्ड के निर्माणस्थान महाकाश में उदक-जल के निर्माणस्थान अन्तरिक्ष में (पृश्निगर्भाः) उज्ज्वल वर्णवाली रश्मियाँ गर्भ जिनकी हैं, ऐसे ‘आपः’ अप्तत्त्व प्रारम्भिक सूक्ष्म परमाणु-प्रवाहों को (चोदयत्) प्रेरित करता है (अपां सूर्यस्य सङ्गमे) उन सूक्ष्म अपों को सूर्य के सङ्गमन-वर्षाकाल होने पर (विप्राः) विद्वान् जन (मतिभिः) वाणियों द्वारा (इमम्) इस परमात्मा को (शिशुं न) कुमार जैसे को (रिहन्ति) स्तुत करते हैं या प्रशंसित करते हैं ॥१॥
Connotation: - परमात्मा ब्रह्माण्ड का रक्षक है, लोकनिर्माणस्थान महाकाश में परमाणुओं को प्रेरित करता है, सूक्ष्म के सङ्गमन-समागम समय-प्रातरेव विद्वान् स्तुति करते हैं एवं विद्युद्देव मेघ का रक्षक है, वर्षा समय उसकी प्रशंसा करते हैं ॥१॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

आपः - सूर्य

Word-Meaning: - [१] (अयं वेनः) = यह मेधावी पुरुष (रजसः) = रजोगुण के (विमाने) = विशिष्ट मानपूर्वक धारण करने पर (पृश्निगर्भा:) = सात उज्ज्वल वर्णवाली ज्ञानरश्मियाँ जिसके गर्भ में है उन वेद-ज्ञानों को (चोदयत्) = अपने में प्रेरित करता है वेदवाणियाँ सात छन्दोंवाले मन्त्रों में हैं। सूर्य की किरणें भी सात रंगों की हैं। वेद-ज्ञान सूर्य है, तो सात छन्दोंवाले मन्त्र उसकी सात उज्ज्वल किरणें हैं । वेन इन्हें अपने में धारण करता है । इन्हें धारण करने के लिए ही वह रजोगुण को विशिष्ट मानपूर्वक अपने में धारण करता है। रजोगुण के नितान्त अभाव में तो किसी भी क्रिया का सम्भव ही नहीं रहता । इस प्रकार इन पृश्निगर्भा वेदवाणियों को अपने में प्रेरित करता हुआ यह (ज्योतिर्जरायुः) = ज्योतिर्मय वेष्टनवाला होता है, अपने को ज्ञान से आच्छादित करता है। [२] (अपाम्) - रेतः कणों के तथा (सूर्यस्य) = ज्ञान के सूर्य के (संगमे) = मेल के होने पर, अर्थात् जिस समय रेतः कणों का रक्षण होता है और ज्ञान के सूर्य का उदय होता है तो उस समय (विप्राः) = ज्ञानी पुरुष (मतिभिः) = इन मननशील बुद्धियों के द्वारा (इयम्) = इस प्रभु का (रिहन्ति) = आस्वाद लेते हैं। प्रभु का मनन करते हुए ये लोग अपने हृदयों में आनन्द का अनुभव करते हैं । उसी प्रकार इसके मनन में आस्वाद को अनुभव करते हैं (न) = जैसे कि गौवें (शिशुम्) = अपने बछड़े को चाटती हुई आनन्द का अनुभव करती हैं ।
Connotation: - भावार्थ- संयत रजोगुण के द्वारा वेन ज्ञान को प्राप्त करता है। रेतः कणों का रक्षण करता हुआ तथा ज्ञान के सूर्य के उदय को करता हुआ यह मनन के द्वारा प्रभु प्राप्ति के आनन्द का अनुभव करता है ।

BRAHMAMUNI

अस्मिन् सूक्ते परमात्मा ब्रह्माण्डस्य रक्षको लोकानां चालकः वेदज्ञानस्य दाता यश्च वेदः शाश्वतिकः, परमेश्वरो जीवात्मनो हृदयगृहे मित्रवत् प्रवेशं करोतीत्येवमादयो विषयाः सन्ति।

Word-Meaning: - (अयं वेनः) एष कमनीयः परमात्मा “वेनो वेनतेः कान्तिकर्मणः” [निरु० १०।३९] “वेनात् कमनीयात् परमात्मनः” [ऋ० ४।५८।४ दयानन्दः] यद्वा इन्द्रो विद्युद्देवः “इन्द्रो वै वेनः” [कौ० ८।४] “यदशनिरिन्द्रः” [कौ० ६।९] (ज्योतिर्जरायुः) ज्योतिरस्य जरायुस्थानीयं यस्मिन् सर्वं जगद् गर्भरूपं रक्षति, मेघं रक्षति वा (रजसः-विमाने) रञ्जनात्मकस्य लोकसमूहस्य ब्रह्माण्डस्य निर्माणस्थाने महाकाशे उदकस्य निर्माणस्थानेऽन्तरिक्षे वा (पृश्निगर्भाः-चोदयत्) पृश्निः उज्ज्वलः शुभ्रो वर्णो येषां ते रश्मयो गर्भो गर्भभूता यासां ताः पृश्निगर्भाः-आपः प्रारम्भिक्यः सूक्ष्मास्ताः प्रेरयति (अपां सूर्यस्य सङ्गमे) तासां सूक्ष्माणां सूर्यस्य सङ्गमने वर्षणकाले सति (विप्राः) विद्वांसः (मतिभिः) वाग्भिः “वाग् वै मतिः” “वाचा हीदं सर्वं मनुते” [श० ८।१।२।७] (इमं शिशुं न रिहन्ति) इमं परमात्मानं विद्युद्देवं वा शंसनीयं कुमारमिव स्तुवन्ति प्रशंसन्ति वा “रिहन्ति अर्चतिकर्मा” [निघं० ३।१४] ॥१॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - This loving and lovely light, glorious sun, womb of light, shines in varied light and beauty in the ocean of particles of mist in middle space, moves and energises the clouds of vapour, and in the meeting of the sun rays and the vapours sages celebrate and adore the sun with songs of prayer and love with gratitude as a child of divinity.