Word-Meaning: - [१] (सप्त) = सातों (धामानि) = लोकों के परियन् चारों ओर प्राप्ति करता हुआ - 'भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यं' इन सातों लोकों को अपने में धारण करता हुआ, (अमर्त्यः) = वह अविनाशी प्रभु (दाशुषे) = दाश्वान् के लिए, दान की वृत्तिवाले के लिए, (दाशत्) = देता है । सम्पूर्ण लोकों का स्वामी वह प्रभु है, वह दानशीलों को सब आवश्यक धन देता है। [२] हे (अग्ने) = परमात्मन्! आप (सुकृते) = पुण्यशील व्यक्ति के लिए, यज्ञादि उत्तम कर्मों को करनेवाले के लिए (सुवीरेण) = उत्तम वीरतावाले (रयिणा) = धन से (मामहस्व) = सत्कार करिये। अर्थात् इस पुण्यकर्म को आप वह धन प्राप्त कराइये जो उसे वीर बनानेवाला हो। विषयासक्ति का कारण बननेवाला धन मनुष्य को निर्बल बना देता है। इसके लिए धन विषयासक्ति का कारण न बने और यह उस धन को लोकहित के कार्यों में उपयुक्त करता हुआ सदा वीर बना रहे। उस धन से इसे सत्कृत करिये जो (स्वाभुवा) = [सु आ भू] इसकी स्थिति को सब प्रकार से अच्छा करनेवाला हो। इसके शरीर, मन व बुद्धि को जहाँ यह सुन्दर बनाए, वहाँ इसकी सामाजिक स्थिति भी ठीक हो । [३] हे परमात्मन् ! (यः) = जो (ते आनट्) = आप को प्राप्त करता है, उपासना द्वारा आपका व्यापन करता है, (समिधा) = ज्ञान की दीप्ति द्वारा (तं जुषस्व) = उसके प्रति कृपान्वित होइये [show onesely favourable to wards]।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु दानशील को धन प्राप्त कराते हैं। पुण्यशील को वह धन प्राप्त होता है जो उसे वीर बनाता है और सब प्रकार से अच्छी स्थिति में प्राप्त कराता है। उपासक को प्रभु ज्ञान देने का अनुग्रह करते हैं ।