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तं म॑र्ता॒ अम॑र्त्यं घृ॒तेना॒ग्निं स॑पर्यत । अदा॑भ्यं गृ॒हप॑तिम् ॥

English Transliteration

tam martā amartyaṁ ghṛtenāgniṁ saparyata | adābhyaṁ gṛhapatim ||

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Pad Path

तम् । म॒र्ताः॒ । अम॑र्त्यम् । घृ॒तेन॑ । अ॒ग्निम् । स॒प॒र्य॒त॒ । अदा॑भ्यम् । गृ॒हऽप॑तिम् ॥ १०.११८.६

Rigveda » Mandal:10» Sukta:118» Mantra:6 | Ashtak:8» Adhyay:6» Varga:25» Mantra:1 | Mandal:10» Anuvak:10» Mantra:6


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (मर्ताः) हे मनुष्यों ! (तम्) उस (अमर्त्यम्-अग्निम्) अविनाशी परमात्मा को या पृथिवी जलादि की भाँति कण-कण नष्ट न होनेवाले अग्नि को (अदाभ्यम्) अहिंसनीय (गृहपतिम्) हृदयगृह-स्वामी या यज्ञगृह के स्वामी को (घृतेन) देवकर्म-मुमुक्षुकर्म ब्रह्मचर्यादि से या होम से सेवन करो ॥६॥
Connotation: - मनुष्यों अहिंसनीय अमर परमात्मा हृदयगृह के स्वामी को ब्रह्मचर्य, शम, दमादि के द्वारा अपने अन्दर साक्षात् करें एवं पृथिवी जलादि के समान कणशः नष्ट न होनेवाले यज्ञगृह के स्वामी अग्नि को होम के द्वारा प्रतिदिन सेवन करें ॥६॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

अदाभ्य-गृहपति

Word-Meaning: - [१] हे (मर्ताः) = मनुष्यो ! (तम्) = उस (अमर्त्यम्) अविनाशी (अग्निम्) = प्रभु को (घृतेन) = ज्ञान की दीप्ति तथा मलों के क्षरण से सपर्यत पूजित करो। वे प्रभु (अदाभ्यम्) हिंसित होने योग्य नहीं । (गृहपतिम्) = इस शरीररूप गृह के वे रक्षक हैं । [२] जब तक मनुष्य प्रभु के उपासन से दूर रहते हैं तब तक संसार के इन तुच्छ विषयों में ही फँसे रह जाते हैं। इन विषयों के लिए अत्यन्त लालायित होने से इनके पीछे मरते रहने से ही वे 'मर्त' कहलाते हैं । प्रभु अमर्त्य हैं, प्रभु का उपासक भी अमर्त्य बनता है। प्रभु प्राप्ति के आनन्द की तुलना में विषयरस समाप्त हो जाता है। विषयों से हमें ऊपर उठाकर प्रभु हमारे इन शरीरों को जीर्ण होने से बचाते हैं, इसी से प्रभु 'गृहपति' कहलाते हैं। वे प्रभु हमारे काम-क्रोधादि शत्रुओं को विनष्ट करते हैं। हमें ये शत्रु हिंसित कर ले, पर प्रभु 'अदाभ्य' हैं, प्रभु हमारे लिये इनका संहार करते हैं ।
Connotation: - भावार्थ- हम प्रभु का उपासन करते हैं, प्रभु हमारे शत्रुओं का संहार करके हमारे शरीर- गृह का रक्षण करते हैं।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (मर्ताः) हे मनुष्याः ! “मर्ताः-मनुष्यनाम” [निघ० २।३] (तम्-अमर्त्यम्-अग्निम्) तमविनाशिनं परमात्मानं यद्वा पृथिवीजलादिवत् कणशो न नश्यति तथाभूतं विनाशरहितमग्निं वा (अदाभ्यं गृहपतिम्) अहिंसनीयं हृदयगृहस्वामिनं यद्वा यज्ञगृहस्वामिनं (घृतेन सपर्यत) देवकर्मणा मुमुक्षुकर्मणा ब्रह्मचर्यादिना यद्वा होमेन सेवध्वम् ॥६॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - That immortal Agni, the mortals serve with ghrta, Agni that is the redoubtable master protector of the home and family.