वृष्टिहव्य - उपस्तुत व ऋषि पुरुषों की ऊर्ध्वगति
Word-Meaning: - [१] जो व्यक्ति हव्य पदार्थों की वृष्टि करनेवाले, अर्थात् अग्नि में हव्य पदार्थों को डालनेवाले हैं वे यज्ञशील हैं। ये वृष्टिहव्य कहलाते हैं । इसी भाव को प्रबलरूप में कहने के लिए ('वृष्टि हव्यस्य पुत्राः') = वृष्टिहव्य के पुत्र इस शब्द का प्रयोग हुआ है । (उपस्तुतासः) = उपासना में बैठकर प्रभु का स्तवन करनेवाले तथा (ऋषयः) = तत्त्वद्रष्टा ज्ञानी लोग हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (त्वा) = आपको (इति) = उपरोक्त मन्त्र के 'ऊर्जोनपात् व सहसावन्' इन शब्दों में (अवोचन्) = पुकारते हैं । (तान् च) = उन वृष्टिहव्य के पुत्रों को, यज्ञशील व्यक्तियों को (गृणतः च) = स्तवन करनेवाले उपस्तुतों को (सूरीन्) = ज्ञानी ऋषियों को (पाहि) = हे प्रभो ! आप रक्षित करिये। हाथों में यज्ञशील, हृदय में स्तवन की वृत्तिवाले तथा मस्तिष्क में ज्ञानवाले व्यक्तियों का आप रक्षण करिये । [२] (वषट् वषट् इति) = सदा यज्ञों में 'स्वाहा'=[स्व-हा] स्वार्थत्याग को करते हुए ये यज्ञशील पुरुष उर्ध्वासः अनक्षन् - ऊर्ध्वगतिवाले होते हैं। नमः नमः इति - सदा प्रातः समय आपके प्रति नमन को करते हुए (ऊर्ध्वासः अनक्षन्) = ऊर्ध्वगतिवाले होते हैं । यज्ञशील व उपासक पुरुष उत्कृष्ट लोक को प्राप्त करते हैं ।
Connotation: - भावार्थ- यज्ञशील, स्तोता, ज्ञानी पुरुष प्रभु से रक्षणीय होते हैं, ये ऊर्ध्वलोकों को प्राप्त करते हैं। सूक्त का सार इस अन्तिम मन्त्र में सम्यक्तया संकेतित हो गया है। ऐसा बनने वाला पुरुष 'अग्नियुतः स्थौर: 'प्रभु से युक्त शक्तिशाली होता है, प्रभु की उपासना करता है और प्रभु की शक्ति का प्रवाह उसमें चलता है । अथवा यह 'अग्नियूपः स्थौर: 'यज्ञाग्नि के स्तम्भोंवाला, यज्ञशील व शक्तिशाली होता है यज्ञिय वृत्ति होने से भोगों से ऊपर उठा रहता है और अपनी शक्ति को स्थिर रख पाता है। यही अगले सूक्त का ऋषि है । यह इन्द्र बनकर सोम का पान करता है, जितेन्द्रियता द्वारा वीर्य का रक्षण करता है। यह वीर्यरक्षण ही इसकी सब उन्नतियों का साधन होता है-