Word-Meaning: - [१] 'आचत्वारिंशतः संपूर्णता' इस सुश्रुत वाक्य के अनुसार ४० वें वर्ष में शरीर के निर्माण की पूर्णता हो जाती है। इन चालीस वर्षों में भी यहाँ मन्त्र में 'षट् त्रिंशान् च चतुर: ''३६ और ४' इस विभाग से यह प्रतीत होता है कि छत्तीस तक पूर्णता हो जाती है और अन्तिम चार वर्ष तो finishing toxehes दिये जाते रहते हैं। इसी प्रकार चालीसवें में जीवन का पूरा निर्माण हो जाता है । (षट् त्रिंशान् चतुरः च) = छत्तीस और चार, अर्थात् चालीस वर्ष तक (कल्पयन्तः) = अपने अंगों को सामर्थ्यवान् बनाते हुए (च) = और (आद्वादशम्) = बारह वर्ष की उमर तक (छन्दांसि) = सब वेदमन्त्रों को (दधतः) = धारण करते हुए 'आठवें वर्ष में आचार्यकुल में प्रविष्ट होने पर बारहवें वर्ष तक सब वेद सामान्यतः याद करा दिये जाते थे'। इस पाठ्य-प्रणाली का यहाँ संकेत मिलता है। (कवयः) = ज्ञानी लोग (मनीषा) = बुद्धि के द्वारा (यज्ञं विमाय) = यज्ञों को विशेषरूप से करके (ऋक्सामाभ्याम्) = विज्ञान और उपासना से विद्या व श्रद्धा से (रथम्) = अपने जीवनरथ को (प्रवर्तयन्ति) = निरन्तर कार्यों में प्रवृत्त करते हैं। [२] यहाँ मन्त्र में इन बातों का संकेत सुस्पष्ट है कि- [क] शरीर की पूर्णता चालीसवें वर्ष में आकर होती है। तब तक परिवर्तन का सम्भव होता है। चालीसवें वर्ष में आकर सब अंगों का निर्माण हो चुकता है, [ख] शिक्षा-प्रणाली में प्रारम्भिक पाठ्यक्रम सब मन्त्रों का याद करना है, यह बारहवें वर्ष में पूर्ण हो जाता है, [ग] जीवन यथासम्भव बुद्धिपूर्वक यज्ञों के करने में बीतना ही ठीक है, [घ] सब कार्य विद्या व श्रद्धा के समन्वय से किये जाने चाहिएँ ।
Connotation: - भावार्थ - विद्या व श्रद्धा से कार्यों को करते हुए हम जीवन यात्रा में निरन्तर आगे बढ़ें।