पवित्र हृदय में प्रभु-दर्शन
Word-Meaning: - [१] प्रभु (एकः) = अद्वितीय (सुपर्णः) = पालन व पूरण करनेवाले हैं। प्रभु की एक-एक रचना पालन व पूरण करनेवाली है । (सः) = वे प्रभु (समुद्रम्) = आनन्दयुक्त, प्रसादमय, हृदय में (आविवेश) = प्रवेश करते हैं। जिस हृदय में क्रोध व राग-द्वेष का कूड़ा-करकट भरा होता है वहाँ प्रभु का निवास नहीं होता। इसी दृष्टिकोण से (मनः) = प्रसाद का महत्त्व है, यह मनः प्रसाद सर्वोत्कृष्ट तप है । (सः) = वे प्रभु (इदं विश्वं भुवनम्) = इस सम्पूर्ण लोक को विचष्टे-देखते हैं व पालते हैं [look after ]। प्रभु की सब क्रियाएँ हमारे पालन व पूरण के लिये तो हैं ही। [२] (तम्) = उस परमात्मा को (पाकेन मनसा) = पवित्र मन से (अन्तितः) = अपने समीप ही (अपश्यम्) = मैं देखता हूँ । हृदय के पवित्र होने पर प्रभु हृदय में ही स्थित दिखते हैं। इस दर्शन के होने पर माता - यह (प्रमाता) = ज्ञान का निर्माण करनेवाला (तं रेढि) = उस प्रभु का आस्वाद लेता है, प्रभु-दर्शन से अद्वितीय आनन्द का अनुभव करता है । (उ) = और (सः) = वे प्रभु भी (मातरम्) = इस ज्ञान के निर्माता का रेढि आनन्द लेता है ज्ञानी प्रभु- दर्शन से आनन्द को प्राप्त करता है तो प्रभु भी ज्ञानी से प्रीणित होता है ।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु अद्वितीय पालनकर्ता हैं । पवित्र हृदयों में प्रभु का वास होता है । उसी हृदय में प्रभु - दर्शन होता है। ज्ञानी प्रभु प्राप्ति का आनन्द लेता है और प्रभु को ज्ञानी प्रिय होता है ।