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इन्द्र॒स्यात्र॒ तवि॑षीभ्यो विर॒प्शिन॑ ऋघाय॒तो अ॑रंहयन्त म॒न्यवे॑ । वृ॒त्रं यदु॒ग्रो व्यवृ॑श्च॒दोज॑सा॒पो बिभ्र॑तं॒ तम॑सा॒ परी॑वृतम् ॥

English Transliteration

indrasyātra taviṣībhyo virapśina ṛghāyato araṁhayanta manyave | vṛtraṁ yad ugro vy avṛścad ojasāpo bibhrataṁ tamasā parīvṛtam ||

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Pad Path

इन्द्र॑स्य । अत्र॑ । तवि॑षीभ्यः । वि॒ऽर॒प्शिनः॑ । ऋ॒घा॒य॒तः । अ॒रं॒ह॒य॒न्त॒ । म॒न्यवे॑ । वृ॒त्रम् । यत् । उ॒ग्रः । वि । अवृ॑श्चत् । ओज॑सा । अ॒पः । बिभ्र॑तम् । तम॑सा । परि॑ऽवृतम् ॥ १०.११३.६

Rigveda » Mandal:10» Sukta:113» Mantra:6 | Ashtak:8» Adhyay:6» Varga:15» Mantra:1 | Mandal:10» Anuvak:10» Mantra:6


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (अत्र) इस अवसर पर (विरप्शिनः) महैश्वर्यगुणयुक्त (ऋघायतः) शत्रुओं को हिंसित करते हुए (इन्द्रस्य) राजा के (तविषीभ्यः) बलवती सेनाओं के सैनिक (मन्यवे) मन्तव्य के लिये-शासन पालन करने के लिये (अरंहयन्त) वेग से गति करते हैं (यत्) जब (उग्रः) प्रतापी राजा (तमसा परीवृतम्) अन्धकार से आच्छादित (अपः-बिभ्रतम्) आप्त प्रजाओं को स्वाधीन करनेवाले (वृत्रम्) शत्रु को (ओजसा) बल से (वि अवृश्चत्) छिन्न-भिन्न करता है-नष्ट करता है ॥६॥
Connotation: - युद्ध के अवसर पर महैश्वर्यवान् शत्रुओं को नष्ट करनेवाले राजा के सैनिक शासन का पालन करने के लिये वेग से आगे बढ़ते हैं, जब कि प्रतापी राजा प्रजा को स्वाधीन करनेवाले शत्रु को नष्ट करता है ॥६॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

वृत्र- व्रश्चन

Word-Meaning: - [१] (अत्र) = यहाँ इस मानव जीवन में (विरप्शिन:) = प्रभु के नामों का उच्चारण करनेवाले (ऋघायतः) = काम आदि शत्रुओं का हिंसन करते हुए (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष के (तविषीभ्यः) = बलों से इसकी इन्द्रियाँ (मन्यवे) = ज्ञान प्राप्ति के लिए (अरंहयन्त) = वेगवाली होती हैं। जब हम जितेन्द्रिय बनते हैं, प्रभु का स्मरण करते हैं और काम आदि का संहार करने के लिए यत्नशील होते हैं तो हमारी इन्द्रियाँ ज्ञान प्राप्ति में प्रवृत्त होती हैं । [३] यह होता तभी है (यद्) = जब कि (उग्रः) = एक तेजस्वी पुरुष (ओजसा) = ओजस्विता से (वृत्रम्) = वासना को (व्यवृश्चत्) = काट डालता है, छिन्न-भिन्न कर देता है । उस वासना को, जो कि (अपः बिभ्रतम्) = [भृ=take away] हमारे रेत: कणों को हमारे से दूर ले जाती है तथा (तमसा परीवृतम्) = अन्धकार से आवृत है । वासना के कारण शक्ति नष्ट होती है, अज्ञानान्धकार बढ़ता है। इस ज्ञान की आवरणभूत वृत्र नामक वासना को जब हम नष्ट करते हैं तो हमारी इन्द्रियाँ ज्ञान प्राप्ति के लिए वेग से आगे बढ़ती हैं ।
Connotation: - भावार्थ- हम वासना का विनाश करके ज्ञान प्राप्ति के लिए अग्रसर हों ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (अत्र) अस्मिन्नवसरे (विरप्शिनः-ऋघायतः-इन्द्रस्य) महैश्वर्यगुण-युक्तस्य “विरप्शिन् महैश्वर्यगुणयुक्तमनुष्यः” [यजु० १।२८ दयानन्दः] शत्रून् हिंसतः “ऋघायतो हिंसतः” [ऋ० ४।३८।८ दयानन्दः] राज्ञः (तविषीभ्यः) तविषीणाम् “व्यत्ययेन षष्ठीस्थाने चतुर्थी” बलवतीनां सेनानां सैनिकाः (मन्यवे-अरंहयन्त) मन्तव्याय शासनाय शासनपालनाय वेगेन गच्छन्ति (यत्-उग्रः) यदा उग्रः प्रतापी राजा (तमसा परीवृतम्) तमसा पूर्णमज्ञानेनाच्छादितम् (अपः-बिभ्रतम्) आप्ताः प्रजाः-स्वाधीनीकरं शत्रुं (ओजसा वृत्रं वि अवृश्चत्) बलेनावरक आक्रमणकारिणं शत्रुं छिन्नं करोति ॥६॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - When the blazing Indra with his might breaks the demonic cloud hoarding the waters of life covered in darkness, then in honour of the brave hero of shattering thunder and his brilliant forces, poets sing songs of adoration.